रांची,सरायकेला: सरायकेला-खरसावां जिले में अवैध शराब का कारोबार अब केवल गैरकानूनी गतिविधि भर नहीं रह गया है, बल्कि यह कुटीर उद्योग का रूप लेता जा रहा है। गांव-गांव, टोला-मोहल्लों तक फैला यह नेटवर्क न सिर्फ कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती बनते जा रहा है, बल्कि सरकार के राजस्व और सामाजिक ताने-बाने को भी गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। हालात ऐसे हैं कि अब इस पूरे अवैध कारोबार पर खुफिया विभाग की भी पैनी निगाहें टिक गई हैं। विभाग कभी कभार छापामारी कर जनता के आई वास करने के लिए कार्रवाई करती है। परंतु छापेमारी से पहले ही सूचनाएं लीक हो जाती है और कारोबारी फरार हो जाते हैं। केवल विभाग फरारी का मामला दर्ज कर इति श्री कर देती है।
बीते कुछ दिनों पहले जिले के उत्पाद अधीक्षक सौरभ तिवारी द्वारा अखिलेश कुमार और नीरज कुमार के कार्यक्षेत्र में अदला-बदली की गई थी। इस प्रशासनिक फेरबदल को लेकर यह उम्मीद जताई जा रही थी कि लंबे समय से फल-फूल रहे अवैध शराब के धंधे पर लगाम लगेगी और कार्रवाई तेज होगी। लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। क्षेत्रीय स्तर पर अवैध शराब का उत्पादन, भंडारण और खुलेआम बिक्री पहले की तुलना में और अधिक तेजी से बढ़ती दिख रही है।

जानकारी के अनुसार अखिलेश कुमार और नीरज कुमार वर्षों से जिले में पदस्थापित हैं। इसके बावजूद उनके कार्यकाल में अवैध शराब के नेटवर्क पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो सका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई इलाकों में कच्ची शराब का निर्माण घरों में ही हो रहा है, जहां महिलाएं और युवा तक इस अवैध धंधे से जुड़ते जा रहे हैं। यह स्थिति विभागीय प्रशासनिक उदासीनता और निगरानी तंत्र की कमजोरी की ओर इशारा करती है।
सूत्रों की मानें तो खुफिया विभाग को भी इस बात के संकेत मिले हैं कि अवैध शराब कारोबारियों का नेटवर्क संगठित रूप ले चुका है और इसमें संरक्षण की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यदि समय रहते संरक्षण प्रदाता अधिकारियों और कारोबारी पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह अवैध धंधा जिले के लिए एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती बन सकता है। केवल रांची से आकर उत्पाद विभाग के टीम द्वारा छापामारी कर अंकुश लगाना संभव नहीं है।अब देखने वाली बात यह है कि उत्पाद विभाग और जिला प्रशासन इस चुनौती से निपटने के लिए कब और कितना ठोस कदम उठाता है।




