दिल्ली रोशनी कुमारी: हम अक्सर सुनते हैं कि बुढ़ापे का सहारा बेटा या बेटी होते हैं। समाज भी यही सिखाता आया है कि बच्चे बड़े होकर माता-पिता का सहारा बनेंगे। लेकिन हकीकत इससे कुछ अलग ही है। सच्चाई यह है कि बुढ़ापे में न बेटा और न ही बेटी जीवन भर का स्थायी सहारा बनते हैं। उनका अपना परिवार, अपनी ज़िम्मेदारियाँ और अपनी प्राथमिकताएँ होती हैं। ऐसे में असली सहारा वही होता है, जो जीवनभर आपके साथ रहा – आपका जीवनसाथी।
यानी पति-पत्नी का रिश्ता,जो जीवन की सबसे गहरी साझेदारी है। बचपन में माता-पिता साथ होते हैं, जवानी में दोस्त और बच्चे साथ रहते हैं, लेकिन बुढ़ापे में धीरे-धीरे सभी दूर हो जाते हैं। बच्चे पढ़ाई, नौकरी, विवाह और अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो जाते हैं। तब इंसान को समझ आता है कि सबसे करीब और सबसे भरोसेमंद वही है, जिसके साथ जीवन के उतार-चढ़ाव साझा किए – यानी पति या पत्नी।

बुढ़ापे में जब शरीर कमजोर हो जाता है, तब एक-दूसरे का सहारा ही सबसे बड़ी ताकत बनता है। अगर पति बीमार हो, तो पत्नी उसकी देखभाल करती है। अगर पत्नी अस्वस्थ हो, तो पति उसका हाथ थामता है। बच्चों का सहयोग मिलता है तो वह बोनस जैसा है, लेकिन रोज़मर्रा की ज़रूरतें और भावनात्मक सहारा जीवनसाथी ही देता है।
इसलिए ज़रूरी है कि समय रहते, पति पत्नी एक-दूसरे की कद्र करें। अक्सर लोग जीवनभर शिकायतों और झगड़ों में रिश्ते को कमजोर करते रहते हैं, लेकिन बुढ़ापे में समझ आता है कि यही रिश्ता सबसे अनमोल है। अगर पति-पत्नी एक-दूसरे के प्रति प्यार, सम्मान और सहयोग बनाए रखें, तो बुढ़ापा बोझ नहीं बल्कि सुनहरा समय बन सकता है।
कड़वी बात यह है कि बच्चे चाहे कितने भी संस्कारी हों, वे हमेशा साथ नहीं रह सकते। वे अपना भविष्य बनाने में व्यस्त होते हैं। लेकिन मीठी सच्चाई यह है कि पति-पत्नी अगर साथ हैं, तो अकेलापन महसूस नहीं होता। यही कारण है कि रिश्ते को बचपन से लेकर बुजुर्गी तक संजोकर रखना चाहिए।
अंत में यही कहा जा सकता है –कि
बुढ़ापे का सहारा न बेटा है, न बेटी। असली सहारा सिर्फ पति और पत्नी होते हैं। इसलिए जीवनसाथी की कद्र कीजिए, क्योंकि वही आख़िर तक ,आपके हाथ थामे और साथ खड़ा रहता है।




