
दिल्ली मीना देवी : आज के इस तेज़ रफ्तार के दौर में इंसान जितना आगे बढ़ रहा है, वह उतना ही कहीं न कहीं अपनों से दूर भी होता जा रहा है। जिंदगी की भागदौड़, जिम्मेदारियों का बोझ और सपनों को पूरा करने की चाह में हम अक्सर उन रिश्तों को पीछे छोड़ देते हैं, जो कभी हमारी सबसे बड़ी ताकत हुआ करते थे। “तलाश अपनों की” सिर्फ एक भाव नहीं, बल्कि आज के दौर की एक कड़वी सच्चाई बन चुकी है।
बचपन में जिन लोगों के साथ हम हंसते-खेलते बड़े होते हैं, समय के साथ वही रिश्ते दूरी में बदल जाते हैं। माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त—सब अपनी-अपनी जिंदगी के जिम्मेदारियां में व्यस्त हो जाते हैं। मोबाइल और सोशल मीडिया ने हमें दुनिया से तो जोड़ दिया, लेकिन दिलों के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया है। हम हजारों लोगों से जुड़े होते हैं, लेकिन जब जरूरत होती है, तो अपने ही कहीं खोए हुए नजर आते हैं।
अपनों की तलाश तब और गहरी हो जाती है, जब इंसान अकेलेपन का सामना करता है। सफलता के शिखर पर पहुंचकर भी अगर साथ देने वाला कोई अपना न हो, तो वह सफलता अधूरी लगती है। ऐसे में दिल बार-बार उन्हीं रिश्तों को याद करता है, जिनमें सच्चाई, अपनापन और बिना किसी स्वार्थ के प्यार होता है।
समय रहते अगर हम अपने रिश्तों को संजो लें, तो शायद यह तलाश इतनी कठिन न हो। अपनों के लिए थोड़ा समय निकालना, उनकी भावनाओं को समझना और उनके साथ जुड़ाव बनाए रखना ही इस तलाश का असली समाधान है। आखिरकार, जिंदगी की असली खुशी अपनों के साथ ही पूरी होती है—क्योंकि भीड़ में भी सुकून वही देता है, जो अपना होता है।




