दिल्ली : भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि परिवार की देखभाल करने वाली महिलाओं के कार्य का महत्व केवल इसलिए कम नहीं माना जा सकता क्योंकि उन्हें नियमित पारिश्रमिक नहीं मिलता। न्यायालय ने माना कि वे घर की व्यवस्था बनाए रखने, बच्चों के पालन-पोषण, बुजुर्गों की देखरेख और पारिवारिक संतुलन बनाए रखने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं।
इसलिए किसी दुर्घटना या अन्य कानूनी मामले में उनकी मृत्यु होने पर क्षतिपूर्ति निर्धारित करते समय उनके योगदान का उचित आकलन किया जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल प्रत्यक्ष कमाई न होने के आधार पर भुगतान राशि घटाना उचित नहीं है। महिलाओं द्वारा किए जाने वाले दैनिक दायित्वों का सामाजिक और आर्थिक महत्व होता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि मूल्यांकन करते समय आयु, शिक्षा, क्षमता, अनुभव, पारिवारिक दायित्व और परिवार की जीवन-स्थितियों जैसे पहलुओं पर विचार किया जाए। साथ ही, न्यायालय ने संबंधित संस्थाओं और निचली अदालतों को निष्पक्ष तथा व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी। निर्णय में सड़क दुर्घटना से जुड़े मामलों के शीघ्र निस्तारण की आवश्यकता पर भी बल दिया गया, ताकि प्रभावित परिवारों को लंबे समय तक प्रतीक्षा न करनी पड़े। इस टिप्पणी के माध्यम से अदालत ने महिलाओं की घरेलू जिम्मेदारियों के व्यापक महत्व और राष्ट्र के विकास में उनकी अप्रत्यक्ष लेकिन प्रभावशाली भागीदारी को मान्यता दी।





