मीना देवी : दिल्ली: आज का समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ रिश्तों की गरिमा और मानवता दोनों धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं। आए दिन अपने ही हाथों अपने ही रिश्तो के होते कत्ल की लोमहर्ष हृदय विदारक घटनाएं घटित हो रही है। जिससे हमारी जिम्मेदारियां चीख चीख कर कहती है कि हम किसी मोड़ पर हैं। जहां अपने ही अपने रिश्तो के खुलेआम कत्ल कर रहे हैं। किसी ने संपत्ति के लालच में अपने माता-पिता की हत्या कर दी, पति ने पत्नी की जान ले ली, पत्नी ने पति की जान ले ली,या भाई ने भाई का खून कर दिया, प्रेमी ने प्रेमिका की हत्या कर दी प्रेमिका ने प्रेमी की हत्या कर दी, ऐसी हृदय विदारक घटनाएं लगातार दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है। अब सवाल यह उठता है कि हम ,किस मोड़ ,पर हैं। यह केवल अपराध नहीं, बल्कि समाज की संवेदनहीन होती मानसिकता का भयावह रूप और संकेत है। सवाल यह है कि आखिर हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं?

रिश्ते कभी विश्वास, प्रेम, त्याग और अपनत्व की पहचान होते थे। परिवार समाज की सबसे मजबूत कड़ी माना जाता है। लेकिन आधुनिकता, भौतिकवाद और स्वार्थ की अंधी दौड़ ने इंसान को इतना अकेला और कठोर बना दिया है कि अब रिश्ते भावनाओं से नहीं, फायदे, नफे नुकसान और स्वार्थ से तौले जाने लगे हैं। जब मनुष्य के भीतर धैर्य, संस्कार और सहनशीलता कम होने लगती है, तब गुस्सा और लालच रिश्तों पर भारी पड़ने लगते हैं।
मोबाइल और सोशल मीडिया के इस दौर में लोग एक-दूसरे के करीब कम और दूर ज्यादा हो गए हैं। संवाद खत्म हो रहा है, परिवार साथ रहते हुए भी बिखर रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर विवाद बढ़ते हैं और कई बार यही विवाद हिंसा का रूप ले लेते हैं। यह स्थिति केवल कानून व्यवस्था की चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक पतन का भी संकेत है।
जरूरत इस बात की है कि परिवारों में फिर से संस्कार, संवाद और संवेदनाओं को जीवित किया जाए। बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा ही नहीं, बल्कि रिश्तों का महत्व भी सिखाया जाए। समाज को यह समझना होगा कि धन संपत्ति से बड़ा रिश्ता, अपने रिश्ते और इंसानियत है। यदि रिश्तों का खून यूँ ही होता रहा, तो आने वाली पीढ़ियाँ विश्वास और प्रेम से खाली रह जाएगी। जो एक दिन शीशे की तरह ,रिश्ते, खून के रिश्ते ,और समाज को चकनाचूर कर देगी।
आज समय है आत्ममंथन का। क्योंकि जब अपने ही हाथ अपने रिश्तों के कत्ल करने लगें है, तब समझ लेना चाहिए कि समाज एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ से लौटना बेहद जरूरी है।




