रांची : जमशेदपुर में चर्चित डीडी बार में हुई चाकू बाजी हत्या कांड के बाद शहर में कानून-व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है। सोशल मीडिया से लेकर चौक-चौराहों तक लोग पुराने दौर की पुलिसिंग को याद कर चर्चा करने लगे हैं । इसी चर्चा के केंद्र में एक पूर्व आईपीएस एवं वर्तमान कांग्रेस नेता डॉ. अजय कुमार की चर्चाएं भी खूब हो रही है। जिन्होंने कभी जमशेदपुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई थी।
शहर में यह चर्चा आम है कि डॉ. अजय कुमार के कार्यकाल में अपराधियों के बीच पुलिस का ऐसा खौफ था कि कई कुख्यात अपराधियों ने या तो शहर छोड़ दिया था,या फिर जेल की सलाखों के पीछे चले गए थे। अपराध के खिलाफ उनकी सख्त रणनीति और लगातार कार्रवाई की वजह से अपराधियों के हौसले पस्त हो गए थे। लोगों का कहना है कि उस दौर में चोरी, रंगदारी और खुलेआम अपराध की घटनाएं भी अपेक्षाकृत कम सुनाई देती थीं। स्थानीय लोगों के बीच यह भी चर्चा है कि डॉ. अजय कुमार की कार्यशैली केवल कागजी बैठकों तक सीमित नहीं रहती थी। वे खुद सड़कों पर उतरकर पुलिसिंग की निगरानी करते थे।

अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई, मुखबिर तंत्र को मजबूत करना और कानून का सख्ती से पालन कराना उनकी पहचान माना जाता था। इसी कारण उनका नाम सुनते ही अपराधी सतर्क हो जाते थे। डीटी बार कांड के बाद जब शहर में सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, तब लोगों का एक वर्ग पुराने पुलिसिंग मॉडल की तुलना वर्तमान हालात से कर रहा है। सोशल मीडिया पर भी कई लोग यह लिख रहे हैं कि जमशेदपुर को फिर वैसी ही प्रभावी और परिणाम देने वाली पुलिसिंग की जरूरत है, जो अपराधियों में कानून का भय पैदा कर सके।
हालांकि यह भी सच है कि हर दौर की परिस्थितियां अलग होती हैं और अपराध का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा है। इसके बावजूद डीटी बार कांड ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि मजबूत नेतृत्व, त्वरित कार्रवाई और अपराधियों के मन में कानून का डर पैदा करने वाली पुलिसिंग ही कानून-व्यवस्था को प्रभावी बना सकती है। यही वजह है कि वर्षों बाद भी पूर्व आईपीएस डॉ. अजय कुमार की कार्यशैली एक बार फिर शहर की चर्चाओं के केंद्र में दिखाई दे रही है।






