
प्रतीक सिंह दिल्ली : कांग्रेस में बढ़ते विवाद और झामुमो में भी अंदर खाने से बढ़ती हलचल के बीच झारखंड के नए मुख्यमंत्री चंपई सोरेन कहीं फंस तो नहीं गए? यह बार-बार सवाल लोगों की जुबान पर क्यों उठने लगे हैं। क्यों झारखंड की राजनीति दिल्ली मे केंद्रित हो गई है। कई तरह के सवाल सवालों में तैर रहे हैं। बगावती शोर और बढ़ते विरोध के बीच राज्य कहीं राष्ट्रपति शासन की ओर तो नहीं बढ़ रही है?
जिस तरह से राज्य में उत्पन्न राजनीतिक संकट के बीच बढ़ती गतिरोध और विरोध और मान मनोवल काम नहीं आ रही है, और झारखंड से लेकर दिल्ली तक की राजनीतिक दौड़ लगी हुई है। और राज्य की राजनीतिक दिल्ली में केंद्रित हो गई है । जिसके कई कयास लगाए जाने लगे हैं। जिससे चंपई सोरेन सरकार की मुश्किलें बढ़ती जा रही है। कांग्रेस के विधायक जहां आंखें दिखा रहे हैं, तो वहीं झामुमो में भी अंदरखाने बगावती सुर के शोर सुनाई पड़ने लगे है। चंपई सरकार में कांग्रेस के 4 विधायक मंत्री हैं, जिनकी वजह से कांग्रेस के 12 विधायक नाराज चल रहे हैं। कांग्रेस में सिर्फ वही खुश हैं, जिन्हें मंत्री पद मिला हुआ है। आलमगीर आलम, बन्ना गुप्ता, रामेश्वर उरांव, बादल पत्रलेख और प्रदीप यादव ही अभी संतुष्ट दिख रहे हैं, बाकी के 12 विधायकों की नाराजगी साफ साफ नजर आ रही है। कांग्रेस के 17 में से 12 विधायकों की नाराजगी ने पार्टी के साथ ही सरकार के लिए भी मुश्किलें पैदा कर दी है। 81 सदस्यों वाली झारखंड विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 41 है। इनमें सोरेन सरकार के पास 48 विधायक हैं। इनमें 17 विधायक कांग्रेस के हैं। कांग्रेस के 12 विधायक नाराज है। ऐसे में अगर ये सरकार से समर्थन वापस लेते हैं, तो सरकार गिर जाएगी। 2 तिहाई से ज्यादा संख्या होने की वजह से इन्हें दल-बदल कानून से भी परेशानी नहीं होगी।
नाराज विधायकों को हालांकि मनाने की दौर अभी भी जारी है।परन्तु नतीजा कुछ निकलता नहीं दिख रहा है । इधर विधायकों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। इधर नाराज विधायकों ने भी दिल्ली में डेरा डाल रखा है। देखना अब यह है कि झारखंड की राजनीति किस करवट लेती है। अब राज्य के सभी लोगों की निगाहें दिल्ली पर केंद्रित हो गई है। आखिर अब किस करवट झारखंड की राजनीति लेगी




