मीना देवी दिल्ली
: आज के बदलते इस संगीन दौर में रिश्तों की परिभाषा तेजी से बदल रही है। कटु सत्य की सामना करते हुए ,सच्चाई यह है कि “100 कम कर दीजिए, परंतु एक काम नहीं हुआ तो समझ लीजिए की बात बंद” बंद हो गई। यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि आज की मानसिकता का आईना है। अब रिश्ते भावनाओं से नहीं, लेन-देन और स्वार्थ से चलने लगे हैं। जब तक काम निकल रहा है, तब तक मिठास बनी रहती है, लेकिन जैसे ही अपेक्षाएं ,काम पूरी नहीं होतीं, संबंधों में दूरीयां आ जाती है और बातें बंद हो जाती हैं।
पहले रिश्ते विश्वास, धैर्य और समझदारी पर टिके होते थे। लोग एक-दूसरे की कमियों को नजरअंदाज कर, साथ निभाने में विश्वास रखते थे। लेकिन अब छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव हो जाता है और लोग बिना सोचे-समझे दूरी बना लेते हैं। मानो रिश्ते नहीं, कोई सौदा हो—जहां फायदा हुआ तो ठीक, वरना खत्म।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, बढ़ती महत्वाकांक्षाएं और डिजिटल दुनिया ने भी इस बदलाव को और तेज कर दिया है। सोशल मीडिया पर हजारों “कनेक्शन” होने के बावजूद, दिल से जुड़े रिश्ते कम होते जा रहे हैं। लोग अब समय देने से ज्यादा, अपने फायदे को प्राथमिकता देते हैं।
“चौकीय नहीं जनाब!”— यह कोई छोटी या सामान्य बात नहीं है, बल्कि समाज में गहराई से जड़ें जमा चुकी एक गंभीर समस्या है। अगर रिश्तों में केवल स्वार्थ ही रहेगा, तो भावनाएं, अपनापन और विश्वास धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे।
जरूरत इस बात की है कि हम रिश्तों को समझें, उन्हें समय दें, और छोटी-छोटी गलतियों को नजरअंदाज करे। हर रिश्ते में उतार-चढ़ाव आते हैं, लेकिन सच्चे रिश्ते वही होते हैं जो मुश्किल समय में भी साथ निभाते हैं।
रिश्ते निभाने के लिए दिल चाहिए, हिसाब-किताब नहीं। अगर हम इसे समझ जाएं, तो शायद रिश्तों की खोती हुई गर्माहट फिर लौट सकती है।




