रांची: रांची जिले के रामपुर के गडके गांव के पास शनिवार को घटित एक भीषण सड़क हादसे ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इस दुर्घटना में बालू लदे एक तेज़ रफ्तार ट्रक ने नामकुम थाना प्रभारी की गाड़ी को ज़बरदस्त टक्कर मार दी, जिससे थाना प्रभारी और उनके बॉडीगार्ड गंभीर रूप से घायल हो गए और सरकारी गाड़ी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है।

इस हादसे ने सिर्फ एक दर्दनाक घटना को जन्म नहीं दिया, बल्कि इसके साथ ही बालू उत्खनन और तस्करी को लेकर एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) के आदेशों के उल्लंघन पर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
एनजीटी के आदेश और जमीनी हकीकत…
एनजीटी ने स्पष्ट आदेश दिया है कि पर्यावरणीय क्षति को रोकने के लिए अवैध रूप से बालू उत्खनन पर पूर्ण रोक लगाई जाए। इसके बावजूद झारखंड के विभिन्न जिलों में, खासकर रांची और आसपास के क्षेत्रों में, बालू माफियाओं का बोलबाला बना हुआ है। इस ताजा हादसे ने यह दिखा दिया है कि एनजीटी के आदेशों की ज़मीनी अनुपालन में भारी लापरवाही हो रही है। सरकार द्वारा समय-समय पर बालू उत्खनन पर प्रतिबंध की घोषणाएं तो की जाती हैं, लेकिन इन प्रतिबंधों का वास्तविक प्रभाव न के बराबर होता है। बालू से लदे ट्रकों का खुलेआम सड़कों पर दौड़ना इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत या ढिलाई से यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा है।
प्रशासनिक मिलीभगत के आरोप…
हादसे के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों द्वारा यह सवाल उठाया जा रहा है कि जब एनजीटी के आदेश के तहत बालू उत्खनन बंद है, तो ये ट्रक कैसे चल रहे हैं? क्या यह संभव है कि प्रशासन की जानकारी के बिना इतने बड़े पैमाने पर बालू की ढुलाई हो सके? स्थानीय सूत्रों के अनुसार, कई बार इन ट्रकों को रात्रि में चलाया जाता है, जब पुलिस और परिवहन विभाग की निगरानी कमजोर होती है। इसके अलावा कुछ जगहों पर कथित रूप से सुविधा शुल्क लेकर इन ट्रकों को जाने दिया जाता है। यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही ही नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था के साथ एक तरह की साठगांठ भी दर्शाती है।
हादसे के बाद प्रशासनिक हरकत…
हादसे की गंभीरता को देखते हुए रांची के पुलिस अधीक्षक चंदन कुमार सिंह स्वयं अस्पताल पहुंचे और नामकुम थाना प्रभारी की स्थिति का जायज़ा लिया। उन्होंने जांच के आदेश दिए हैं और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की बात कही है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब बालू से लदे ट्रकों की वजह से हादसे हुए हों या अधिकारी घायल हुए हों। सवाल यह है कि क्या केवल जांच और कार्रवाई की घोषणाएं पर्याप्त हैं, या वाकई में ज़मीनी स्तर पर कुछ बदलेगा? जनता की मांग है कि प्रशासनिक जवाबदेही तय हो: पुलिस और खनन विभाग के अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए और उनके कार्यों की स्वतंत्र जांच हो।




