रांची : झारखंड की राजनीति में इन दिनों आंतरिक हलचल महागठबंधन के बीच बढ़ती ही दिख रही है। महागठबंधन के भीतर बढ़ती दरारे सुलगते सवाल ,कई क्यासो के जन्म देने लगे हैं। राज्य में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) के गठबंधन के बीच बयान बाजी की खाई ज्यादा गहरी और चौड़ी होने लगी है। जिसको लेकर राजनीति एवं प्रशासनिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं चलने लगी है।
हाल के महीनों में बयानबाजी अधिक तेज हुई है। “विषैला सांप” जैसे विवादित बयान और खनन माफियाओं को लेकर कांग्रेस के आरोपों ने माहौल को और गर्मा दिया है। कांग्रेस के नेताओं द्वारा अपनी ही गठबंधन की सरकार को घेरना और माफियाओं के दबाव में काम करने का आरोप लगाया जा रहा है। जो सीधे तौर पर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। वहीं एक तरफ JMM का दावा कि कांग्रेस के अलग होने से सरकार पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। कई राजनीतिक विशेषज्ञ इसे दबाव की राजनीतिक की रणनीति भी मान रहे हैं।

दरअसल, यह टकराव कई स्तरों पर है। पहला, प्रशासनिक नियंत्रण और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर। दूसरा, जमीनी स्तर पर संसाधनों—खासतौर पर खनन—को लेकर राजनीतिक वर्चस्व की तौर पर देखा जा रहा है। तीसरा, आगामी चुनावों की तैयारी, जिसमें हर दल अपनी अलग पहचान और जनाधार मजबूत करना चाहता है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) जैसे विपक्षी दल भी इस खींचतान पर नजर रखे हुए हैं और मौके की तलाश में हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान शुरू हुई खटपट अब झारखंड में खुलकर सामने आने लगी है। कांग्रेस अपने संगठन को मजबूत करने और अलग राजनीतिक लाइन दिखाने की कोशिश कर रही है, जबकि JMM नेतृत्व सरकार की स्थिरता बनाए रखने के साथ अपने प्रभाव को कम नहीं होने देना चाहता।
फिलहाल स्थिति “किच-किच के साथ सरकार चलने” वाली ही ज्यादा लगती है। इसके पीछे मुख्य कारण है सत्ता का गणित। दोनों दल जानते हैं कि अलग होने की स्थिति में सरकार गिर सकती है या राजनीतिक नुकसान हो सकता है। ऐसे में सार्वजनिक बयानबाजी के बावजूद अंदरखाने समझौते की गुंजाइश बनी रहती है।




