रांची : राजधानी रांची के रातू अंचल कार्यालय की स्थिति ने सरकारी तंत्र की उदासीनता को उजागर कर दिया है। मंगलवार सुबह जब लोग अपनी समस्याओं को लेकर कार्यालय पहुँचे, तो उन्हें ताले लगे दरवाज़े मिले। अधिकारी गायब थे और कर्मचारियों को भी यह जानकारी नहीं थी कि वे कब आएंगे। यह स्थिति दर्शाती है कि दफ्तर का समय केवल कागज़ों में है, ज़मीनी हकीकत कुछ और है।

गांव से आए लोग सुबह से इंतजार करते रहे, पर कोई सुनवाई नहीं हुई। चौंकाने वाली बात यह रही कि लोगों ने बताया कि असल फैसले और फाइलों की प्रक्रिया अब एक ऑपरेटर ‘अमित जी’ के ज़रिए होती है। अधिकारी की अनुपस्थिति में जनता को उसी से संपर्क करने की सलाह दी जाती है। इससे सवाल उठता है कि जब आम लोग रोज़ हाज़िरी लगाते हैं और काम नहीं होता, तो फिर विशेष शिविरों की ज़रूरत क्यों पड़ती है? अगर जिम्मेदार लोग समय पर कार्यालय में उपस्थित हों, तो समस्याओं का हल नियमित रूप से संभव है। कैंप महज अस्थायी उपाय हैं, लेकिन असली समस्या अधिकारियों की गैरहाज़िरी और प्रशासनिक ढिलाई है।




