
शिवपूजन सिंह रांची: देशभर में मोदी जी को लेकर जो लहर और जोश बताई जा रही थी. वह चुनावी रिजल्ट के दिन बिखर और टूट सा गया. इसके साथ ही सारे एग्जिट पोल की भी पोल खुल गई ,जो साढ़े 350 से लेकर 400 सीट का दम्भ भर रहें थे, और अपनी कामयाबी में मानो पीठ थपथापाने से नहीं चूक रहें थे. एग्जिट पोल एजेंसी ओर टीवी मीडिया की तो भद्द पिट गई. मीडिया का जुमला खूब उछला.
बीजेपी को यूपी, महाराष्ट्र, बंगाल और राजस्थान में जोर का झटका लगा. लगातार दो बार अपने बलबूते बहुमत लाने वाली पार्टी के सामने आज हाल और हालात बदले हुए है. गठबंधन के तहत यानि बेसाखी के सहारे यानि मज़बूरी में सरकार चलानी होगी. इसबार भाजपा के साथी भी ऐसे है, जो गच्चा देने और पलटी मारने में महरथ हासिल कर रखा है . जी हा पलटू चाचा नीतीश की पुरानी हरकतो से कौन वाकिफ नहीं है, जिनकी महत्वकंछा इतनी है कि इन्हें दिन में ही पीएम बनने का ख्वाब समय -समय पर आने लगता है. वही टीडीपी प्रमुख चन्द्रबाबू का इतिहास भी दोस्ती के मामले में कन्नी काटने वाला ही रहा है. उनके पुराने पन्ने भी कुछ ऐसा ही है, जिन्होंने अपने ही ससुर के पीठ में खंजर मारकर आंध्रा प्रदेश की सत्ता में काबिज हुए थे. साथ ही पीएम मोदी से भी इनकी उतनी बनती और छनती नहीं है. लिहाजा प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता तो हासिल कर लिया है, लेकिन ये कांटों भरा ताज से कम नहीं है। जहां की राहों में कई कांटे और बेशुमार उलझने है. अगले पांच साल साथ लेकर चलना ही पीएम मोदी की सबसे बड़ी चुनौती और अग्निपरीक्षा है. जहा मुमकिन है कि हालात उतने सजगार और मुफीद न हो.
सवाल है कि बीजेपी ऐसी सूरत में क्या करें और क्या तरकीब निकाली जाए ,जिससे पार्टी एकबार फिर पुरानी स्थिति में आए.
दरअसल, वक्त आत्मामंथन और चिंतन करने का है. बेशक बाते बाहर नहीं निकलती हो लेकिन भाजपा में आतंरिक कलह तो जोरो पर है। क्योंकि पिछले एक दशक में सिर्फ मोदी और शाह के नाम ही चमकते रहें, बाकी नेताओं को तो दोयमे दर्जे का ही माना गया. राजनाथ, गडकरी, शिवराज, वसुधरा राजे जैसे दिग्गज नेताओ को हाशिये पर ही ला दिया गया. ऐसे मानो ये नेता गुजरे ज़माने की बात हो गये हो.जबकि इनके योगदान को तो, नहीं भूलाया जा सकता. योगी आदित्यनाथ जैसे उभरते नेता पर भी लगाम कसने की बाते भी खूब उड़ने लगी. कहीं न कहीं यूपी में पार्टी की दुर्गति में ये भी एक वजह रही.
पीएम मोदी की अगुवाई में हिंदुस्तान ने देश ही नहीं विदेशों में भी अपनी पहचान बनाई. एक मजबूत लीडर के तौर पर मोदी ने मैजिक भी किया और अपनी लीडरशिप में लोगों को अपना कायल भी बनाया. गांव -गांव में चलाई गई केंद्र की योजनाओ से एक फाकाकाशी की जिंदगी जी रहें गरीब के घर भी उजियारा लाया . इससे इंकार नहीं किया जा सकता. लेकिन दूसरा पहलू ये भी रहा की मोदी जी का नेतृत्व तो दमदार था. लेकिन उनके सांसद बेपरवाह थे. इसके चलते कई दिग्गज सांसद हारे और जो भी जीते उसमे कई को एडी चोटी एक करनी पड़ी.
राहुल गाँधी को चूका हुआ कारतूस मान कर चलना भी भाजपा के लिए भारी भूल साबित हुई. देशभर में निकाली गई, उनकी भारत जोड़ों न्याय यात्रा का असर इस चुनाव में दिखा.कई नेताओं का बडबोलापन और बेतुकी बातों का भी खामियाजा भी बीजेपी को भारी पड़ा. गुजरात के पुरषोत्तम रूपला का राजपूत समुदाय के खिलाफ की गई , भद्दी, बेकार और बेतुकी बात भी बीजेपी को ले डूबी, रूपाला की गैर जिम्मेदारी भरी टिप्पणी के चलते देशभर में राजपूत समुदाय ने गुस्से में अपना आक्रोश जताया. बीजेपी ने इनके विरोध को हल्के में लिया. जिसके चलते भी नुकसान उठाना पड़ा. हालांकि, पार्टी की बहुमत से दूर रहने की और भी कई वजह और पहलू है.
बीजेपी के सामने अभी भी खुद को खड़े करने का समय है. इस पराजय के पीछे की वजहों को दुरुस्त करने की जरुरत है. अगर थोड़ी भी ग़ाफ़िल भरा रवैया अपनाया गया तो फिर पार्टी के लिए मुश्किलों की लम्बी फेहरिश्त सामने होगी और फिर इससे पार पाना कठिन होगा. सबसे बड़ा सवाल है की मोदी जी के बाद अगला कौन लीडर होगा, क्योंकि आज नहीं तो कल इसकी तलाश करनी होगी. पार्टी को बेकउप तैयार रखना होगा.क्योंकि मोदी के बाद कौन ये सवाल उठेगा.
इस चुनाव के बाद तो ये भी तय हो गया की विपक्ष भी एकत्र हुआ है और मज़बूत भी. ऐसे हालात में बीजेपी को तो तनिक भी कोतौही नहीं बरतनी होगी.बेशक इंडिया एनडीए से हार गई, लेकिन राहुल गांधी ने तो अपनी एक अलग छाप छोड़ी, आने वाले वक़्त में उन्हें इसका फायदा मिलेगा.




