दिल्ली : अनुसूचित जाति एवं जनजाति से जुड़े लाभों में आय आधारित सीमा तय करने की मांग वाली याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने विचार करने से इनकार कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे विषय शासन व्यवस्था और नीतिगत निर्णयों के दायरे में आते हैं, जिन पर निर्णय लेने का अधिकार विधायिका को प्राप्त है।
याचिकाकर्ता को सुझाव दिया गया कि वह अपनी मांग संसदीय समितियों के समक्ष प्रस्तुत करें। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आर्थिक रूप से मजबूत वर्गों को आरक्षण संबंधी सुविधाएं मिलते रहना समान अवसर की भावना के विपरीत है। उन्होंने संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए आय सीमा निर्धारित करने की आवश्यकता बताई। उत्तर-पूर्व के कुछ समुदायों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अत्यधिक संपन्न लोगों को भी विशेष सुविधाएं मिलना पुनर्विचार का विषय है।

इस पर न्यायालय ने कहा कि कुछ उदाहरणों के आधार पर किसी पूरे वर्ग के प्रति शंका का भाव उचित नहीं माना जा सकता। यदि किसी व्यवस्था में संशोधन की आवश्यकता महसूस होती है, तो उस पर व्यापक चर्चा लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से होनी चाहिए। इस निर्णय ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि नीतियां तय करना संसद का दायित्व है, जबकि न्यायपालिका संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर कार्य करती है।





