Saraikela (संजीव मेहता) : जमशेदपुर और आदित्यपुर के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला रासायनिक कचरा अब सीधे आम लोगों की सेहत पर हमला कर रहा है. स्वर्णरेखा और खरकई नदियों में वर्षों से प्रवाहित हो रहे औद्योगिक अपशिष्ट के कारण इन नदियों का पानी गंभीर रूप से दूषित हो चुका है. इसी जहरीले पानी से सिंचित खेतों में उगाई जा रही सब्जियां अब लोगों के लिए “धीमा ज़हर” साबित हो रही हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे मामले में सबसे खतरनाक पहलू ‘बायो-मैग्निफिकेशन’ है.
इस प्रक्रिया में लेड, कैडमियम और अन्य भारी धातुएं पहले पानी में घुलती हैं, फिर मिट्टी के माध्यम से सब्जियों के रेशों में समा जाती हैं. ये जहरीले तत्व सब्जियों के भीतर इस तरह जमा हो जाते हैं कि सामान्य धुलाई या पकाने से भी इन्हें हटाया नहीं जा सकता. स्वर्णरेखा और खरकई नदी के किनारे बसे इलाकों में उगाई जा रही हरी सब्जियां, लौकी, बैंगन, पालक, फूलगोभी जैसी फसलें भारी धातुओं से प्रदूषित पाई जा रही हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि लंबे समय तक ऐसी सब्जियों का सेवन करने से कैंसर, किडनी फेलियर, लिवर डैमेज, न्यूरोलॉजिकल समस्याएं और बच्चों में विकास संबंधी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं.

सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस गंभीर खतरे के बावजूद प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है. न तो नदियों में गिर रहे औद्योगिक कचरे पर प्रभावी नियंत्रण है और न ही सब्जियों की नियमित जांच की व्यवस्था. नतीजतन, शहरवासी अनजाने में रोज़ जहरीला भोजन करने को मजबूर हैं. स्थानीय सामाजिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि जल्द ही औद्योगिक इकाइयों पर सख्त कार्रवाई, नदी जल की शुद्धि और खाद्य पदार्थों की वैज्ञानिक जांच शुरू नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में जमशेदपुर गंभीर स्वास्थ्य संकट की चपेट में आ सकता है. अब सवाल यह है कि प्रशासन इस “धीमे ज़हर” को रोकने के लिए कब जागेगा.




