जमशेदपुर : ‘महाकवि भारती ने साहित्य को समाज के साथ जोड़ने का काम किया। उन्होंने मातृभाषाओं की प्रतिष्ठा और नारी जागरण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। भारत जैसे बहुभाषी देश में वे भारतीय भाषाओं के प्रतीक बन चुके हैं। उन्होंने सभी भारतीय भाषाओं के समन्वय के लिए कार्य किया। वे असत्य, पाखंड और परंपरा के अंधानुकरण के विरोधी थे। उन्होंने साकारात्मक राष्ट्रीय चेतना का विकास किया।’’ आज एलबीएसएम कॉलेज में महाकवि सुब्रमण्यम भारती की जयंती के अवसर पर आयोजित ‘भारतीय भाषा उत्सव’ के मुख्य वक्ता के तौर पर संबोधित करते हुए कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और साहित्य अकादमी के पूर्व कार्यकारी सदस्य साहित्यकार डॉ. अशोक कुमार झा ‘अविचल’ ये बातें कहीं। महाकवि विद्यापति के कथन- देसी बयना सब जन मीठा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसा ही काम महाकवि भारती ने भी किया। उन्होंने तमिल को आम जन के लिए सहज बनाया। उन्होंने यह भी कहा कि भारत एक बहुभाषिक देश है। यदि विभिन्न भाषाभाषी लोग अपनी भाषाओं के स्तर पर एक दूसरे के संपर्क में नहीं आएंगे, तो इस देश को समझ नहीं पाएंगे। आयोजन की अध्यक्षता करते हुए कॉलेज के प्राचार्य डॉ. बी.एन. प्रसाद ने कहा कि ‘‘आदमी की जिंदगीी कितनी लंबी है, यह मायने नहीं रखता। जिंदगी समाज और देश के लिए कितनी सार्थक है यह मायने रखता है। सुब्रमन्यम भारती ने मात्र 40 साल की छोटी-सी जिंदगी में बहुत बड़ी भूमिका निभायी। उन्होंने भारतीय भाषाओं के बीच सेतु का काम किया। तमिल के अतिरिक्त वे दूसरी भारतीय भाषाएं जानते थे। आजादी की प्राप्ति और जाति भेद की समाप्ति तथा शिक्षा और समाजसुधार के लिए उन्होंने कवि, स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और सुधारक के रूप में उनका योगदान अप्रतिम है।’’भारतीय भाषा उत्सव का आरंभ दीप प्रज्जवलन से हुआ। उसके बाद हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. पुरुषोत्तम प्रसाद ने स्वागत वक्तव्य दिया। इस मौके पर बबिता सरदार, यशोदा टुडू, पर्सी हेम्ब्रम, प्रिया हेम्ब्रम, सोनामणि मुर्मू, अमिषा रानी, सोना मार्डी ने भाषा और लिपि से संबंधित अपने लेखों को पढ़ा तथा कविता-पाठ और गीतों का गान किया।

संचालन करते हुए अंग्रेजी की विभागाध्यक्ष डॉ. मौसमी पॉल ने मातृभाषा के महत्त्व पर जोर दिया। उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए बांग्ला विभागाध्यक्ष डॉ. संचिता भुईसेन ने कहा कि मातृभाषा में सीखना अधिक आसान होता है। उन्होंने बांग्ला में अपनी कविता भी सुनायी। उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. शबनम परवीन ने अपनी नज्म के माध्यम से उर्दू की खासियत का जिक्र किया कि खुलते जुबां कि मेरे झरते हैं फूल। प्रो. शिप्रा बोयपाई ने हो और प्रो. बाबूराम सोरेन ने संताली भाषा के महत्त्व पर प्रकाश डाला। हिन्दी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुधीर कुमार ने कहा कि भाषाओं के हृदय का आयतन बढ़ाना होगा। उनका रिश्ता हमारी आत्मा और हमारे अस्तित्व से है। उन्होंने महाकवि भारती की तीन कविताओं- स्वतंत्रता, जानेवाला भारत: आने वाला भारत और कन्नमा, मेरी प्रिया कविताओं का सस्वर पाठ करते हुए उनके विचारों और सपनों से रूबरू कराया।
धन्यवाद ज्ञापन राजनीति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार गुप्ता ने किया। इस मौके पर दर्शनशास्त्र के विभागाध्यक्ष डॉ. दीपंजय श्रीवास्तव, प्रो संतोष राम, भौतिकी की विभाध्यक्ष डॉ. सुष्मिता धारा, वनस्पति शास्त्र की विभागाध्यक्ष डॉ. जया कच्छप, इतिहास की विभागाध्यक्ष डॉ. स्वीकृति, वाणिज्य विभाग के अध्यक्ष डॉ. विजय प्रकाश, भूगोल के असिस्टेंट प्रोफसर डॉ. संतोष कुमार, मनोविज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर प्रो. प्रमिला किस्कू आदि मौजूद थे।




