मीना देवी : ईश्वर का विधान और प्रकृति का न्याय कभी असफल नहीं होता। मनुष्य अपने कर्मों से भाग्य बनाता भी है और बिगाड़ता भी है। यह आवश्यक नहीं कि हर कर्म का फल उसी व्यक्ति को तत्काल मिल जाए, किंतु इतना निश्चित है कि कर्मों का प्रभाव कभी व्यर्थ नहीं जाता। यदि उसका परिणाम हमारे जीवनकाल में नहीं दिखाई देता, तो उसकी छाया हमारे बच्चों और आने वाली पीढ़ियों तक अवश्य पहुँचती है।
आज का समाज इस सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है। जिन परिवारों ने सत्य, ईमानदारी, परिश्रम और सेवा को अपना धर्म बनाया, उनकी संतानों को समाज में सम्मान, विश्वास और प्रतिष्ठा मिली। वहीं जिन लोगों ने छल, भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण और स्वार्थ को सफलता का साधन बनाया, वे भले कुछ समय तक ऐश्वर्य का सुख भोगते रहे हों, लेकिन उनके कर्मों का दुष्परिणाम किसी न किसी रूप में उनके परिवार और बच्चों को भी सहना पड़ता है। बदनामी की विरासत धन-दौलत से कहीं अधिक भारी होती है।
बच्चे केवल माता-पिता की संपत्ति के उत्तराधिकारी नहीं होते, वे उनके संस्कार, व्यवहार, प्रतिष्ठा और कर्मों के भी उत्तराधिकारी बनते हैं। पिता के कर्मों से अर्जित सम्मान उन्हें समाज में सिर उठाकर चलने का साहस देता है, जबकि गलत कार्यों से अर्जित संपत्ति उनके जीवन पर प्रश्नचिह्न लगा देती है। इसलिए सबसे बड़ी विरासत धन नहीं, बल्कि स्वच्छ चरित्र और निष्कलंक जीवन है।
हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हमारा प्रत्येक निर्णय केवल हमारे वर्तमान को नहीं, बल्कि हमारे बच्चों के भविष्य को भी प्रभावित करता है। इसलिए जीवन में ऐसा कोई कार्य न करें, जिससे क्षणिक लाभ तो मिल जाए, लेकिन आने वाली पीढ़ियाँ शर्म, संघर्ष और अपमान का बोझ उठाने को विवश हों।
याद रखिए—कर्मों का हिसाब समय अवश्य लेता है। न्याय में देर हो सकती है, अंधेर नहीं। इसलिए ऐसा जीवन जिएँ कि आपके जाने के बाद भी लोग आपके बच्चों से यह कहें—”तुम्हें ऐसे माता-पिता का आशीर्वाद मिला, जिन्होंने अपने चरित्र और कर्मों से समाज में सम्मान अर्जित किया।” यही सबसे बड़ी संपत्ति है, यही सबसे अमूल्य विरासत है, और यही जीवन की वास्तविक सफलता भी।






