कहते हैं कि हर दौर अपने हिसाब से अफसर गढ़ता है। लेकिन कुछ अफसर ऐसे भी होते हैं जो इस “व्यवस्था” की चाल से कदम मिलाने के बजाय अपने उसूलों पर अड़े रहते हैं। शायद इसलिए लोग तंज कसते हैं—”वो साहब आज के दौर के लायक नहीं हैं।”
कारण भी बड़ा “गंभीर” है। न खुद गलत करते हैं, न किसी की गलत फाइल पर आंख मूंदकर दस्तखत करते हैं। ऊपर से हद तो तब हो जाती है जब साफ कह देते हैं—”जहां करना है ट्रांसफर कर दीजिए, लेकिन गलत काम नहीं होगा।”
आज के समय में यह संवाद किसी अपराध से कम नहीं माना जाता। यहां तो कई जगह ईमानदारी योग्यता नहीं, बल्कि “कमजोरी” समझी जाने लगी है। जो जितना ज्यादा समझौता करे, वह उतना ही “व्यावहारिक” कहलाता है और जो नियम-कानून की बात करे, उसे “जिद्दी”, “अड़ियल” या “सिस्टम के लायक नहीं” बता दिया जाता है।
साहब की सबसे बड़ी गलती यही है कि वे कुर्सी को सुविधा का साधन नहीं, जिम्मेदारी का बोझ मानते हैं। सिफारिशों की फाइलें उनके कमरे में दम तोड़ देती हैं और दबाव की राजनीति उनके दरवाजे से ही लौट जाती है। ऐसे अफसर स्वाभाविक रूप से उन लोगों की आंखों की किरकिरी बन जाते हैं, जिनके लिए नियम सिर्फ दूसरों पर लागू होते हैं।
विडंबना देखिए, आज ईमानदार अफसर की चर्चा उसके काम से कम और संभावित ट्रांसफर से ज्यादा होती है। मानो संदेश साफ हो—जो झुकेगा नहीं, वह टिकेगा नहीं।
लेकिन सवाल यह है कि अगर हर ईमानदार अफसर को यही सुनना पड़े कि “आप आज के दौर के लायक नहीं हैं”, तो फिर इस दौर के लायक आखिर कौन है? वह जो हर गलत आदेश पर सिर झुका दे, या वह जो कानून और अपने जमीर के सामने सिर ऊंचा रखे?
शायद समय बदल गया है, लेकिन कुछ लोग अब भी अपने सिद्धांत नहीं बदलते। इसलिए ऐसे साहब अक्सर तबादलों की सूची में जरूर मिल जाते हैं, लेकिन समझौतों की सूची में कभी नहीं।






