साहब, कुर्सी का सबसे बड़ा भ्रम यही होता है कि उस पर बैठा आदमी खुद को अजर-अमर समझने लगता है। उसे लगता है कि उसके इशारे के बिना पत्ता भी नहीं हिलेगा। लेकिन समय मुस्कुराता है, क्योंकि उसे पता होता है कि जिसकी कलम आज दूसरों की तकदीर लिख रही है, कल वही अपनी पोस्टिंग, प्रतिष्ठा और पहचान बचाने की जद्दोजहद करता नजर आ सकता है।समय का खेल बड़ा निराला है। कल तक जिनके दफ्तर के बाहर गाड़ियों की कतार लगी रहती थी, आज उनके फोन की घंटी तक खामोश हो जाती है। जो लोग कभी मिलने का समय नहीं देते थे, उन्हें बाद में कोई दो मिनट देने वाला भी नहीं मिलता। यही समय का सबसे बड़ा खेल है।
साहब, जनता की याददाश्त कमजोर नहीं होती। वह चुप जरूर रहती है, लेकिन सब कुछ नोट करती रहती है—किसने न्याय किया, किसने अहंकार दिखाया और किसने कुर्सी को अपनी जागीर समझ लिया। समय जब हिसाब लेता है तो न पीए बचाता है, न प्रोटोकॉल और न ही लाल-नीली बत्ती का रुतबा।

इसलिए कुर्सी को ताज मत समझिए, यह जिम्मेदारी है। आज जिस कुर्सी पर आपका नाम लिखा है, कल वहां किसी और की नेमप्लेट होगी। फर्क सिर्फ इतना रहेगा कि लोग आपके जाने पर अफसोस करेंगे या राहत की सांस लेंगे।
याद रखिए साहब, समय न किसी का रिश्तेदार होता है, न शुभचिंतक। वह सिर्फ कर्मों का लेखा-जोखा रखता है। उसकी अदालत में न सत्ता काम आती है, न सिफारिश और न ही प्रभाव। वहां फैसला सिर्फ कर्मों के आधार पर होता है। इसलिए यदि इतिहास में सम्मान चाहिए तो पद का नहीं, अपने व्यवहार का कद बढ़ाइए। क्योंकि समय जब पलटवार करता है, तो तस्वीर बदलने में एक पल और तकदीर बदलने में एक आदेश ही काफी होता है।






