रांची : हेमंत सोरेन ने जनजातीय समाज की मौजूदा हालत पर गहरी पीड़ा जताते हुए इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था की कठोर हकीकत बताया। उनका कहना है कि जिन लोगों ने औपनिवेशिक ताकतों के आगे कभी समर्पण नहीं किया और प्रकृति व अपने संसाधनों की रक्षा में लंबा संघर्ष किया, आज वही अपने ही देश में पहचान और अधिकार पाने के लिए भटक रहे हैं।
उनके अनुसार यह केवल सत्ता या नीति का विषय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक गौरव के अनादर का मामला है। उन्होंने सीधो मुर्मू और कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में हुए संथाल रिबेलियन तथा बिरसा मुंडा के उलगुलान का उल्लेख करते हुए पूछा कि जिनके पूर्वजों ने बहुत पहले स्वतंत्रता की चिंगारी जलाई, उनके वंशज आज सम्मान के लिए संघर्ष क्यों कर रहे हैं। यह टिप्पणी ऐसे दौर में आई है।

जब क्षेत्र में पहचान, परंपरा और संसाधनों पर अधिकार को लेकर चर्चा तेज है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लड़ाई केवल आर्थिक लाभ की नहीं,बल्कि संस्कृति, विरासत और अस्तित्व को बचाने की है। साथ ही संस्थाओं से आत्ममंथन की अपील करते हुए कहा कि जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय नहीं मिलेगा, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।



