दिल्ली : भारत में परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। नीट-यूजी का दोबारा आयोजन बिना बाधा संपन्न हुआ, मगर समस्या सिर्फ प्रश्नपत्र लीक तक सीमित नहीं। यह ढांचागत खामी है। एनटीए ने 12 मई को नीट रद्द कर दिया था, जबकि 22.7 लाख छात्र पहले ही शामिल हो चुके थे। दो साल में ऐसी दूसरी घटना हुई। परीक्षा स्थगित करना कभी-कभी मजबूरी हो सकता है, पर नुकसान नियम-पालन करने वाले मेहनती विद्यार्थियों का ही होता है। भारत विश्व की विशालतम मूल्यांकन प्रक्रियाएं चलाता है, लेकिन इन्हें संभालने वाला ढांचा पुराना है। आज के दायरे, पेचीदगी और प्रलोभनों के हिसाब से तंत्र को आधुनिक नहीं किया गया। केवल निगरानी बढ़ाने से समाधान नहीं होगा।
एनटीए ने 2018-2023 के दौरान 244 इम्तिहान कराए। प्रतिभागी संख्या 67 लाख से 122 लाख पहुंच गई। अकेले नीट में एक बार में 22-24 लाख युवा बैठते हैं। 2024 में चीन की गाओकाओ में 134.2 लाख नामांकन था, कोरिया की सीएसएटी 2026 में 5.54 लाख तक सीमित है। नीट गाओकाओ से छोटा, पर कोरिया के राष्ट्रीय टेस्ट से बड़ा है। फर्क यह कि चीन-कोरिया सालाना एक केंद्रीकृत टेस्ट कराते हैं। हमारी व्यवस्था निरंतर, बहुभाषी, विकेंद्रीकृत और व्यापक है। इसलिए विदेशी मॉडल यहां उपयुक्त नहीं। चीन-कोरिया एक निर्णायक टेस्ट हेतु पूरा प्रशासन झोंक सकते हैं। भारत वर्ष में दस बार समूचे तंत्र को सुरक्षा ड्यूटी पर नहीं लगा सकता। हमें अपने स्तर के अनुकूल ढांचा चाहिए: सुदृढ़, मॉड्यूलर, तकनीक-सक्षम, संचालन में स्वायत्त, मगर मानकों में एकरूप।

2024 के विवादों बाद डॉ. के. राधाकृष्णन समिति ने चुनौती पहचानी। रिपोर्ट ने एनटीए के जरिए पारदर्शी, व्यवस्थित, निष्पक्ष आयोजन हेतु व्यापक सुधार सुझाए। संदेश साफ है: नया ढांचा चाहिए। पहला कदम संस्थागत सुदृढ़ीकरण है। तकनीक कमजोर संस्था की क्षतिपूर्ति नहीं करती, वह खामियों को डिजिटल शक्ल दे देती है। एनटीए को स्थायी, प्रोफेशनल, मिशन-केंद्रित इकाई बनाना होगा। इसमें साइकोमेट्रिक्स, साइबर सुरक्षा, रसद, डेटा एनालिटिक्स, प्रश्न-निर्माण, वेंडर प्रबंधन, कानून-प्रवर्तन की अंदरूनी दक्षता हो। सिर्फ ठेकेदारों, अस्थायी पर्यवेक्षकों, आउटसोर्स प्रक्रिया पर टिकी एजेंसी बड़े इम्तिहान नहीं संभाल सकती। दूसरा कदम प्रश्न-निर्माण प्रक्रिया दुरुस्त करना है।
सुरक्षित पेपर वह है जिसे कोई अकेला व्यक्ति पूरा न देख सके। यूपीएससी, जेईई एडवांस्ड की मजबूती यही है: बड़ा अनाम पैनल, स्तरवार बंटवारा, कई समानांतर सेट, रैंडमाइजेशन, निजी बिचौलियों की सीमित पहुंच। इससे एक कड़ी टूटने पर भी पूरा टेस्ट नहीं बिगड़ता। एक दिन पर छात्र का भविष्य निर्भर नहीं होना चाहिए। बहु-चरणीय टेस्ट, ज्यादा मौके, मानकीकृत अंकन, साफ शिकायत तंत्र चाहिए। एक पेपर की काला-बाजारी कीमत घटेगी तो व्यवस्था सुधरेगी। तीसरा कदम तकनीकी उन्नयन है, पर तकनीक को सिस्टम के अनुकूल होना होगा। बड़ा डायनामिक प्रश्न बैंक, कंप्यूटर आधारित टेस्ट, एडाप्टिव मूल्यांकन भविष्य है। डिजिटल ढांचा बनाना होगा। राधाकृष्णन समिति का 1000 केंद्रीय विद्यालयों व भरोसेमंद सार्वजनिक संस्थानों को सुरक्षित केंद्र बनाने का सुझाव लागू हो। पहचान व निगरानी तंत्र मजबूत करें। एआई को फॉरेंसिक जांच में इस्तेमाल किया जा सकता है।






