रांची: हम साहब के खासमखास में से हैं—यह जुमला आज 
की व्यवस्था और मानसिकता का आईना बन चुका है। यह कोई साधारण कथन नहीं, बल्कि सत्ता, पहुँच और प्रभाव के घमंड से भरा हुआ वाक्य है। जब कोई थानेदार यह कहता है कि “कुछ महीने में ही साइड से मेन में और बगल में ही,आ गए”, तो वह अपनी योग्यता से अधिक ,अपनी साहब से नज़दीकी का बखान करता है। यह बताता है कि यहाँ मेहनत, अनुभव और ईमानदारी से ज़्यादा महत्व पहचान और सिफारिश का है।
ऐसी सोच धीरे-धीरे कानून की विधि व्यवस्था को खोखला कर देती है। जो लोग वर्षों तक नियमों का पालन करते हुए, संघर्ष और धैर्य के साथ आगे बढ़ते हैं, उनके मन में हताशा जन्म लेती है। वहीं, कुछ लोग सत्ता के गलियारों में चुपचाप रास्ता बना लेते हैं और खुद को अजेय समझने लगते हैं। “खासमखास” होने का यह दंभ उन्हें यह भ्रम देता है कि नियम उनके लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए हैं।
लेकिन इतिहास गवाह है कि अस्थायी पहुँच स्थायी सम्मान नहीं दिला सकती। समय के साथ चेहरों से नकाब उतरते हैं और असल काबिलियत सामने आती है। जो आज साइड से मेन में पहुँचे हैं, अगर उनके पास काम, चरित्र और जिम्मेदारी का आधार नहीं होगा, तो कल वही मेन से फिर साइड में धकेल दिए जाएंगे।
असल में, सच्ची प्रगति वह है जो मेहनत, ईमानदारी और निरंतर सीखने से मिलती है। सत्ता की छाया में मिली तेज़ रफ्तार सफलता भले ही चमकदार लगे, लेकिन उसकी नींव अक्सर कमजोर होती है। टिकाऊ पहचान वही है, जो बिना किसी “साहब” के सहारे बनाई जाए।






