जमशेदपुर: छठ महापर्व एक अत्यंत पवित्र और लोक आस्था का पर्व है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया की उपासना के लिए मनाया जाता है। इस व्रत में पवित्रता, नियम और संयम का विशेष महत्व होता है। छठ की तैयारी कई दिनों पहले से शुरू हो जाती है। व्रती महिलाएँ पूरे मनोयोग और श्रद्धा से पूजा की सामग्री तैयार करती हैं। इन्हीं तैयारियों में गेहूं चुनना और सुखाना एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है।
सुबह की कोमल धूप में गाँव या मोहल्ले की गलियों में व्रती महिलाएँ सूप या चलनी लेकर बैठी दिखाई देती हैं। उनके सामने गेहूं का ढेर होता है। वे बड़ी सावधानी से उसमें से कंकड़, भूसी और अशुद्ध दाने अलग करती हैं। यह काम केवल भोजन की स्वच्छता के लिए नहीं, बल्कि एक धार्मिक कर्म माना जाता है। क्योंकि पूजा में प्रयुक्त हर वस्तु को शुद्ध और सात्विक होना चाहिए। जब गेहूं चुन लिया जाता है, तो उसे धूप में सुखाने के लिए साफ कपड़े पर फैला दिया जाता है। सुनहरी धूप में चमकते गेहूं के दाने जैसे खुद आस्था की ज्योति बिखेरते हों।

इस दौरान व्रती महिलाएँ आपस में छठ के गीत गुनगुनाती हैं — “केलवा जे फरेला घवद से…” — और वातावरण भक्ति रस से भर जाता है। आसपास बच्चों की चहक, धूप की गर्माहट और हवा की हल्की सरसराहट मिलकर एक अलौकिक दृश्य बनाती है। गेहूं सूख जाने के बाद उसी से आटा पिसवाकर प्रसाद — ठेकुआ — तैयार किया जाता है। यह पूरा दृश्य न केवल श्रद्धा और परिश्रम का प्रतीक है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में निहित स्वच्छता, सामूहिकता और भक्ति की परंपरा को भी जीवंत करता है। छठ वर्तियों का यह समर्पण दर्शाता है कि आस्था केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के हर कर्म में पवित्रता और ईमानदारी का भाव होना चाहिए।




