
Ranchi : (Shivpujan Singh ) अटकले और अनुमान ख़त्म हो गई हैं, सरायकेला के विधायक और कोल्हान टाइगर चंपाई सोरेन ने हेमंत सोरेन की आकांक्षा के चलते मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया हैं. विधानसभा चुनाव में महज चार से पांच महीने का ही वक़्त बचा हैं. लेकिन, चुनाव की इस दहलीज पर चंपाई सोरेन को कुर्सी से बेदखल करके हेमंत सोरेन क्या साबित करना चाहते हैं और उनकी क्या ख्वाहिश और मंशा हैं?. ये तो नहीं मालूम.. लेकिन, चंपाई सोरेन ने इन पांच महीनों में अपनी जिम्मेदारी और वज़ूद तो जरूर बना गए. बेशक वक़्त की मांग, मौक़े की नजाकत और झनझावतों के चलते मज़बूरी में उन्हें सत्ता सौपी गई. लेकिन कोल्हान के इस टाइगर ने खुद को साबित किया कि प्रदेश चलाने की कुव्वत और काबिलियत कूट -कूट कर उनमे भरी हुई हैं. कहीं न कहीं अफ़सोस और मलाल तो उनमे होगा ही कि कम से कम विधानसभा चुनाव तक मुख्यमंत्री बने रहने देना चाहिए था.लेकिन, उनके अरमान जमीन पर आ गए. दरअसल, उम्मीद उतनी परवान पर नहीं थी कि चंपाई आसानी से और इतनी जल्दी किनारे कर दिए जायेंगे. बदलाव की आहट 28 जून को अंगड़ाई लेने लगी थी, जब जमीन घोटाले के आरोप में हाई कोर्ट से ज़मानत लेकर हेमंत सोरेन बाहर निकले थे. एक हफ्ते का वक़्त भी नहीं बीता की चंपाई को हटाने का फरमान 3 जुलाई को विधायक दल की बैठक में सुनना पड़ा. जबकि, हकीकत की धरती पर आए तो चंपाई अपना काम बड़ी शिद्दत और सुकून से कर रहें थे. उनकी कमान पर विपक्ष भाजपा भी उतना हमलावर नहीं थी और न ही उनपर इस दरमियान किसी तरह की भ्रष्टाचार की तोहमत ही विपक्ष लगाया.अचानक उनको हटाने से विपक्ष हेमंत सोरेन पर सख्त रुख अख्तियार कर हमले करेगा, शायद ही इसमे कोई शक दिखता है. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी इसे लेकर हेमंत सोरेन पर निशाना साध चुके हैं. उनका कहना इस बदलाव पर बेबाक था कि शिबू सोरेन परिवार से बाहर का आदिवासी काम चलाउ है. शिबू सोरेन का परिवार जब चाहेगा उसका इस्तेमाल करेंगा और फिर दूध में मक्खी की तरह बाहर निकलकर फेक देगा.लाजमी है कि चंपाई सोरेन की तरफ एक सहानुभूति भी साथ होगी और लोगो का साथ सिर्फ पार्टी में ही नहीं बल्कि विपक्ष भी उन्हें साथ लेकर हेमंत सोरेन पर तंज और निशाना साधेगा.
अब देखना है कि चंपाई सोरेन को क्या नई जिम्मेदारी पार्टी में मिलती है. बेशक गद्दी से सरायकेला विधायक उतर गए, लेकिन, एक सवाल तो उपजेगा ही कि आखिर इतनी जल्दी भी क्या थी?. आखिर हेमंत सोरेन ने विधानसभा चुनाव तक सब्र क्यों नहीं किया?. क्या वाकई शिबू सोरेन परिवार के इतर किसी नेता कि पार्टी में नहीं चलनेवाली है?.इन तमाम सवालों के साथ एक सवाल ये भी सिर उठाएगा कि क्या हेमंत सोरेन को सत्ता की भूख कुछ ज्यादा ही है? जबकि, बड़गाई जमीन घोटाले के आरोप में अभी बेदाग साबित नहीं हुए हैं. अभी उन्हें ज़मानत ही मिली है.ये तो तय है कि चंपाई को लेकर भाजपा भी कड़े प्रहार हेमंत सोरेन पर करेगी, जिसका जवाब उन्हें देना पड़ेगा.इधर सीधे -साधे चंपाई सोरेन जिस शालीनता से इस कुर्सी पर बैठे थे. वह उसी ख़ामोशी से उतर गए. आगे दिलचस्प मोड़ विधानसभा चुनाव के पहले और बाद में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा की सियासत में क्या आता है ये देखने वाली बात होगी?.बेशक चंपाई मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतर गए, लेकिन उनकी कद्र कम नहीं होगी, बल्कि कोल्हान के इस टाइगर की दहाड़ बरकरार ही रहेगी.





