जमशेदपुर : साहब!आज ऐसा लगता है कि इंसानी जिंदगी की कीमत दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। मामूली कहासुनी, सड़क पर हुई बहस, आपसी रंजिश या अपराधियों की दबंगई—हर विवाद का अंत अब चापड़ के वार से होने लगा है। एक पल का गुस्सा किसी मां की गोद सूनी कर देता है, किसी पत्नी का सुहाग छीन लेता है और मासूम बच्चों के सिर से पिता का साया हमेशा के लिए उठा देता है।
साहब! सवाल चापड़ का नहीं है, सवाल उन हाथों और उस सोच का है जो इसे बेखौफ होकर चलाती है। जब कानून का डर खत्म होने लगे, अपराधियों के हौसले बुलंद हों, नशा और हिंसा युवाओं की सोच पर हावी हो जाए, तब समाज में ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ने लगती हैं। सबसे बड़ा दर्द यह है कि हर घटना के बाद कुछ दिन शोर मचता है, फिर सब कुछ सामान्य हो जाता है—लेकिन जिस परिवार का घर उजड़ता है, उसकी जिंदगी कभी सामान्य नहीं होती।

इलाज सिर्फ हथियार जब्त करने से नहीं होगा। जरूरत है अपराधियों पर त्वरित और कठोर कार्रवाई की, अवैध हथियारों के कारोबार पर पूरी तरह रोक लगाने की, युवाओं को सही दिशा देने की और समाज में कानून के प्रति विश्वास मजबूत करने की। परिवार, समाज, पुलिस और प्रशासन—सभी को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। हर खून से सनी सड़क, हर मातम में डूबा घर और हर मासूम की चीख हमसे यही सवाल पूछ रही है—”आखिर कब रुकेगा यह खूनी खेल?” यदि आज भी हम नहीं चेते, तो कल किसी और घर का चिराग बुझ जाएगा। हथियार नहीं, इंसानियत को ताकत बनाना होगा। हिंसा नहीं, कानून और संवाद को अपनाना होगा। क्योंकि वार सिर्फ शरीर पर नहीं होता, वह पूरे परिवार की जिंदगी पर होता है। साहब कुछ तो कीजिए, ऐसा कोई जांबाज नहीं, जो ये बेरहम चापड़ कि शोर को खत्म कर दे।






