जमशेदपुर : राजनीति अरु कविता मिलकर, सुन्दर रचना कर डाली ।
कोमल और मृदुल बानी से, अपने को ही गढ़ डाली ।।
देश धरा गढ़ने निकलें जब, सबने साथ निभाया था।
मित्र सखा स्वजनों से मिलकर , अपना कदम बढ़ाया था।
सत्य सनातन धर्म लिए फिर, कोष भरे परिपाटी से।
स्वयं लगाया तिलक पावनी, चंदन जैसे माटी से।
भारत माँ के पुण्य चरण में, खुद को अर्पित कर डाली ।
कोमल और मृदुल वाणी से, अपने को ही गढ़ डाली ।।
आर्यन से आर्यावर्ती बन, सबको लेकर संग चले ।
धर्मवीर बनकर तनकर ही, निज चरित्र को रंग चले ।
प्रखर अटल वक्ता हो कर भी, मृदुल बोल ही बोले थे ।
अपने तन-मन जीवन पथ में, प्रेम सुधा ही घोले थे।
पत्रकार, कवि कहलाकर भी, प्रेम प्रीति रज संभाली ।
कोमल और मृदुल वाणी से, अपने को ही गढ़ डाली ।।

भले मतों का खेल रहा पर, स्वयं रहे पावन मत के।
परम योग्यता के निज बल से, बने प्रमुख वे भारत के।
हिंदी को सम्पूर्ण विश्व में, हर सम्मान दिलाते थे।
उद्बोधन हिंदी में कहते, हिंदी कविता गाते थे।
हिंदी को वे सदा समझते, भारत की कुमकुम लाली।
कोमल और मृदुल वाणी से, अपने को ही गढ़ डाली ।।






