पटना: भारत में चुनावी मौसम आते ही राजनीतिक दलों की ओर से मुफ्त योजनाओं की घोषणाओं की बाढ़ आ जाती है — कहीं बिजली मुफ्त, कहीं गैस सिलेंडर, तो कहीं महिलाओं को भत्ता या बेरोजगारों को नकद सहायता का वादा। सवाल यह उठता है कि क्या ऐसी “फ्री घोषणाएं” लोकतंत्र के लिए लाभदायक हैं या ये जनता को लुभाने वाली “चुनावी घूस” के समान हैं?
दरअसल, लोकतंत्र में जनता का वोट ही सबसे बड़ी ताकत है। जब कोई राजनीतिक दल जनता को आवश्यक सुविधाएं देने का वादा करता है, तो यह विकास नीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन जब ये वादे बिना ठोस आर्थिक आधार या नीतिगत सोच के केवल वोट हासिल करने के लिए किए जाते हैं, तब ये “चुनावी प्रलोभन” बन जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर चिंता जताई है कि अंधाधुंध मुफ्त योजनाओं की घोषणा से राज्य की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ता है और यह भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय है। चुनाव आयोग भी इस विषय पर कई बार चर्चा कर चुका है, परंतु अभी तक इस पर कोई ठोस कानून नहीं बना है।

यदि कोई पार्टी चुनाव से ठीक पहले मुफ्त लैपटॉप, स्कूटी या नकद राशि देने का वादा करती है, तो यह मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में यह नैतिक रूप से “चुनावी घूस” जैसा ही प्रतीत होता है, क्योंकि यह जनता की वास्तविक जरूरतों की बजाय वोट खरीदने का प्रयास बन जाता है। विकास और कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य समाज को सशक्त बनाना होना चाहिए, न कि मतदाताओं को क्षणिक लाभ देकर भ्रमित करना। अतः आवश्यक है कि चुनाव आयोग और संसद इस विषय पर स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए, ताकि लोकतंत्र की पवित्रता बनी रहे और चुनाव केवल “फ्री के लालच” पर नहीं, बल्कि नीतियों और विकास के मुद्दों पर लड़े जाएं। इस प्रकार कहा जा सकता है कि बिना ठोस आर्थिक आधार और नीति के की गई “फ्री घोषणाएं” वास्तव में चुनावी घूस के समान हैं — जो लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करती हैं।




