रांची : शिखा जैन की ज़िंदगी एक मिसाल है, जो साबित करती है कि साहस और मेहनत से हर बाधा पार की जा सकती है। हज़ारीबाग़ की रहने वाली शिखा मात्र सात वर्ष की थीं जब एक बम धमाके में वह शारीरिक रूप से अक्षम हो गईं। इस त्रासदी के कुछ समय बाद ही उनके पिता का देहांत हो गया, लेकिन उनकी मां ने कभी हार नहीं मानी। सीमित साधनों के बावजूद मां ने निजी विद्यालय में पढ़ा-लिखाकर शिखा के सपनों को पंख दिए।

विपरीत परिस्थितियों में भी शिखा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। लगातार प्रयास और आत्मबल के दम पर उन्होंने शैक्षणिक उपलब्धियाँ हासिल कीं। आज उनका संघर्ष रंग लाया जब झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्वयं उन्हें सरकारी विद्यालय में अध्यापक बनने का नियुक्ति पत्र सौंपा। यह उपलब्धि केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए प्रेरणा है जो कठिन हालातों में भी उम्मीद नहीं छोड़ते। शिखा ने भले ही चलने की क्षमता खो दी हो, पर अपने आत्मविश्वास और शिक्षा से समाज में एक मजबूत पहचान बनाई। उनकी यात्रा बताती है कि अगर इरादे अडिग हों, तो कोई भी रुकावट रास्ता नहीं रोक सकती।




