
शिवपूजन सिंह : रांची : झारखंड की सियासत में सियासी दांव पेच चलते रहते है. यहां राजनीतिक रंजिशे वोट बटोरने के लिए ही होती है, क्योंकि सियासत का यहीं हिसाब -किताब और मिजाज होता है. जहां जीत -हार तो लगी रहती है और मुद्दे के जरिए ही जनता के सामने अपनी बात पुरजोर तरीके से रखी जाती है.
लोकसभा चुनाव के ख़त्म होने के बाद झारखण्ड में भी बीजेपी अपनी सीट गवाई है, उसे 3 सीट का नुकसान झेलना पड़ा. संथाल और कोल्हान का किला आज भी भेदना उसके लिए हसरत और ख्वाब सरीखा ही दिखता है.खूंटी, लोहरदगा के साथ ही दुमका की सीटीग सीट भी भाजपा की निकल गई, जबकि सोरेन परिवार की बहू सीता सोरेन यहां से चुनावी अखाड़े में थी.लेकिन, कोई कमाल नहीं दिखा पाई.
चुनाव प्रचार के दौरान पीएम मोदी अबकी बार 400 सौ पार का नारा जिस तरह लगा रहें थे. इससे ऐसा लग रहा था और ये कयास और अनुमान भी आसमान में खूब उछाले जा रहें थे की. बीजेपी झारखण्ड में भी बेहतर प्रदर्शन करेगी.
भाजपा को इस बात का भी इत्मीनान था कि, कथित जमीन घोटाले के आरोप में जेल में बंद पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के भ्रष्टाचार का मुद्दा उनके लिए मुफीद और साजगार साबित होगा. लेकिन, ऐसा हो नहीं सका. झारखण्ड बीजेपी प्रमुख बाबूलाल ने भी खूब जोर लगाया और सोरेन परिवार पर खूब तोहमतों के नुकीले तीर चलाये.लेकिन, यह कहिए तीर निशाने पर नहीं लगा या फिर बेअसर साबित हुआ.हेमंत सोरेन के जेल भेजने का मसला जेएमएम ने खूब उठाया और संथाल कोल्हान में अपने अमेध किले में भाजपा को सेंधमारी नहीं करनी दी.
हेमंत के सलाखों में रहने से आदिवासी समुदाय पर सहानुभूति की लहर का ही नतीजा रहा कि इसबार पिछले बार की तुलना में 1 की बजाय 3 सीट पर जेएमएम ने कब्जा किया. राजमहल के साथ ही झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने दुमका और चाईबासा सीट भी अपने नाम कर ली.बीजेपी हेमंत सोरेन के जेल जाने के पीछे की वजह सही तरीके से बता नहीं सकी. वह भ्रष्टाचार को सही से जनता के सामने न समझा और न ही पेश कर सकी.
हालांकि, हेमंत सोरेन की वाइफ कल्पना सोरेन इस दरमियान खुद सामने खड़ा होकर पार्टी में नई जान फूंक दिया. कल्पना के आने से बिखरी और टूटी दिख रही पार्टी जेएमएम में एक नई ताकत का संचार हुआ. चुनावी जलसों में उनके आंखों से निकले आंसू ने भी सहानुभूति की लहर पैदा की, दरअसल, हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद पार्टी की हालत बेहद विकट थी.
इस नाजुक और अहम वक़्त में कल्पना सोरेन ने अपने सियासी आगाज में ही खुद को साबित किया और कामयाब भी हुई. गांडेए उपचुनाव में उन्होंने जीत का परचम भी लहरा दिया.इधर, अभी ज़मानत के लिए लगातार कोशिश कर रहें हेमंत सोरेन सलाखों से बाहर आते है कि नहीं. ये तो देखने वाली बात होगी. अगर विधानसभा चुनाव तक भी हेमंत जेल में रहते है, तो जेएमएम को इसका फायदा मिलेगा. पार्टी इस मुद्दे को जनता के सामने जोरों से इसे भूनायेगी और इसके लिए भाजपा पर निशाना और जिम्मेदारी थोपेगी .
विधानसभा चुनाव में याद रखने की बात ये है कि झारखण्ड मुक्ति मोर्चा हेमंत सोरेन के जेल भेजने के मुद्दे को जोर -शोर से उठायेगी. इसमे दो मत नहीं है. सवाल यहीं है भाजपा इसकी काट क्या निकालती है? और कैसे अपने तरकश में सजी तीर से विजयी निशाना विधानसभा चुनाव में लगाती है. ये देखना दिलचस्प होगा.
दूसरी तरफ बीजेपी तत्कालीन हेमंत सोरेन सरकार के दौरान हुए मनरेगा, खनन, जमीन और शराब घोटाले को लेकर राज्य सरकार को घेरेगी. देखना यहीं है कि इसका असर चुनाव के वक़्त क्या होता है.




