Ranchi :(शिवपूजन सिंह ):- सियासत में लक्ष्य सिंहासन ही होता है. सारी कलाबाजियां, कसरते और कारनामे इसी के चलते होती है. झारखण्ड के वजूद में आए अब ढाई दशक होने को है. यहां की सियासी फ़िजा में सरगरमियां हमेशा बनी रहती है. यहां सियासतदानों की हसरते और हिचकिचाहटें हमेशा से सुर्खियां बटोरते रहती है. कभी भी खोमोशी की चादर नहीं ओढ़े रहती. न जाने कितने नेता है, जिन्होंने कितने दल घूमकर सत्ता में भागीदारी की खातिर क्या से क्या नहीं किया और क्या से क्या बयानबाजियां नहीं की. लेकिन, इसी सत्ता के लिए वो पिछली बाते ऐसे भूल गए, मानो उसके कोई मायने और वजूद मौज़ूदा वक़्त में नहीं है. जबकि, इस प्रदेश के इतिहास को देखिए तो कई लीडर्स मुख्यमंत्री बने, जिसमे मधु कोड़ा से लेकर, अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन, बाबूलाल मरांडी, हेमंत सोरेन, रघुवर दास,चंपाई सोरेन सरीखे नाम हैं. अर्जुन मुंडा, शिबू सोरेन और वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन तो तीन -तीन बार सीएम बन चुके हैं.
अभी झारखण्ड विधानसभा चुनाव मुहाने पर है, सत्ता के लिए सियासी पलटियां, तल्ख़ीयां और तोहमतों का दौर जारी है. बयानवीर सियासतदान चुनावी बयार बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ रहें हैं.
झारखण्ड चुनाव में असली टक्कर तो बीजेपी और जेएमएम में ही है. यहां जय -पराजय किसके माथे पर आएगी, अभी कहना मुनासिब नहीं. अभी तो अखाड़ा ही सज रहा है और बिसात ही बिछाई जा रही है.
सवाल यहां यही है कि अगर इंडिया गठबंधन जीतती है, तो मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर तो मौज़ूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नाम पर लगेगी. इसमे शायद ही कोई शक नजर आता है. अगर हेमंत फिर सीएम बनते हैं तो रिकॉर्ड चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होंगे.
लेकिन, विरोधी खेमे यानि एनडीए मुख्यतौर पर भाजपा की ओर से चीफ मिनिस्टर का दावेदार कौन होगा?ये अभी भी उलझे हुए धागे के मानिंद उलझा हुआ हैं.
सवाल हैं कि झारखण्ड के पहले मुख्यमंत्री और 2019 में अपनी पार्टी जेवीएम को भाजपा में विलय करने वाले आदिवासी नेता बाबूलाल मरांडी ही मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार होंगे?. बाबूलाल झारखण्ड के एक पुराने, अनुभवी और मंजे हुए नेता हैं. उनका दावा कमजोर भी नहीं माना जा सकता. लेकिन, सवाल हैं कि क्या वाकई बीजेपी उन्हें सीएम बना देगी? क्या उनके मुकाबले झारखण्ड बीजेपी में कोई चेहरा नहीं हैं? प्रश्न ये भी हैं कि क्या बाबूलाल ही सभी के स्वाभाविक पसन्द होंगे ?
खैर ये तो सवालों की फेहरिश्त हैं, जिसका जवाब तो पार्टी आलाकमान के सीनियर लीडर्स ही जानते होंगे. सच्चाई तो अभी तक यही हैं कि अभी मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर भाजपा ने किसी के नाम का ऐलान नहीं किया हैं. हा ये जरूर हैं कि झारखण्ड बीजेपी के अध्यक्ष बाबूलाल भी रेस में हैं, लेकिन अंतिम मुहर अभी नहीं लगी हैं. इस साल हुए लोकसभा चुनाव की कमान बाबूलाल की अगुवाई में ही भाजपा ने चुनाव लड़ा था लेकिन, प्रदर्शन उतना अच्छा नहीं रहा. भाजपा गठबंधन 12 की जगह 9 सीट ही जीत सकी, अब विधानसभा चुनाव तो बाबूलाल के लिए असल इम्तिहान हैं, जहां उनके लिए बड़ी चुनौती होगी. अगर उनकी कमान में कमल खिलता हैं और सत्ता आती हैं तो उनका दावा मजबूत माना जायेगा.
अगर भाजपा की सोच को समझे और उसके पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री के चेहरे चुनने पर गौर फरमाए तो वो बिल्कुल अनजान नाम पर ही मुहर लगाती आ रही हैं. लोकसभा चुनाव से पहले हुए मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जीत दर्ज की थी. एमपी में शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और राजस्थान में वसुंधरा राजे को दावेदार माना जा रहा था. लेकिन, बीजेपी ने इन नामचीन नामो को किनारा कर दिया. इनकी जगह एमपी में मोहन यादव, छत्तीसगढ़ में विष्णु देव साई और राजस्थान में भजन लाल शर्मा को चीफ मिनिस्टर बनाया गया. जबकि, इन नामों की कोई चर्चा-अंदेशा या सुगबुगाहट तक नहीं थी. हालांकि पार्टी ने एक सन्देश जरूर दिया कि कोई भी इस कुर्सी तक पहुंच सकता है. सबसे चौकने वाली बात ये है कि विधानसभा चुनाव भी प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा आगे करके लड़ा गया.
झारखण्ड में भी भाजपा कुछ इसी तरह कर सकती है. आखिरी मौक़े पर चौका सकती है. बाबूलाल मरांडी आदिवासी चेहरा है, लेकिन उनके साथ ही दावेदार अर्जुन मुंडा, चंपाई सोरेन और सीता सोरेन भी है.इन नमो पर भी भारतीय जनता पार्टी सोच सकती है.
कुलमिलाकर यही कहां जा सकता है सीएम की दौड़ में कई नाम है. भगवा पार्टी मुख्यमंत्री के लिए किसी भी चेहरे को आगे कर सकती है. अगर भाजपा चुनाव जीतती है, तो सबसे दिलचस्प चीज़ यही देखने को मिलेगी कि आखिर सीएम का फेस कौन होगा? और किसे मौका देगी?.
आपको याद होगा 2014 के चुनाव की जीत के बाद गैर आदिवासी चेहरे को भाजपा ने मौका दिया और रघुवर दास को मुख्यमंत्री बना दिया था.
दरअसल, इसबार बीजेपी शायद किसी आदिवासी को ही मुख्यमंत्री बनाए. लेकिन, यहां किसी के नाम पर आखिरी मुहर तो अभी नहीं है. इसलिए ये माना जा सकता है कि बाबूलाल मरांडी तय नहीं है कि एनडीए की तरफ से मुख्यमंत्री बनेंगे.
खैर आगे क्या होता है ये देखना दिलचस्प होगा. क्योंकि भाजपा में एक से एक दिग्गज नेताओं की भरमार है.अभी चंपाई सोरेन के बीजेपी से जुड़ने की खबर से बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा के भीतर -भीतर नाराजगी की खबरें सामने आ रही थी. लाजमी है की चंपाई भी सीएम की रेस में होंगे और उनकी भी दावेदारी और दावा किसी से कम नहीं होगा.क्योंकि चंपाई भी एक संताल आदिवासी और झारखण्ड आंदोलन से पनपे नेता हैं और एक लंबा सियासी तजुर्बा और आदिवासी -मूलवासियों की भावना और संस्कृति को जानते-समझते हैं.
बहरहाल, अभी भाजपा का पहला मिशन विधानसभा चुनाव जीतने की होगी.इसके बाद ही मुख्यमंत्री किसे बनाया जाए इसपर रायशुमारी और विधायक दल की बैठक के बाद ही फैसला लेगी.




