रांची : होली उल्लास, मेलजोल और सामूहिक आनंद का पर्व है, जिसे लोग परिवार और समुदाय के साथ हर्षोल्लास से मनाते हैं। रंगों से भरे इस उत्सव से पहले एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान होता है—होलिका दहन। यह परंपरा बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक मानी जाती है और फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या पर अग्नि प्रज्वलित कर संपन्न की जाती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन समय में प्रह्लाद नामक बालक भगवान विष्णु का अनन्य उपासक था। उसके पिता हिरण्यकशिपु अत्याचारी शासक थे और स्वयं को सर्वशक्तिमान मानते थे। वे नहीं चाहते थे कि उनके राज्य में कोई भी ईश्वर की आराधना करे। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका पुत्र ही उनकी आज्ञा का पालन नहीं कर रहा, तो उन्होंने उसे दंडित करने के कई प्रयास किए। किंतु हर बार दिव्य कृपा से बालक सुरक्षित रहा।

अंततः हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली। उसे अग्नि से अजेय रहने का वरदान प्राप्त था। योजना के तहत वह अग्नि-कुंड में प्रह्लाद को लेकर बैठी, यह सोचकर कि बालक भस्म हो जाएगा। किंतु दैवी संरक्षण के कारण परिस्थिति उलट गई—होलिका स्वयं जलकर राख हो गई और प्रह्लाद को कोई क्षति नहीं पहुँची। इस घटना को धर्म की विजय के रूप में देखा जाता है। तभी से होली से एक दिन पूर्व अग्नि प्रज्वलित कर उस ऐतिहासिक प्रसंग की स्मृति को जीवित रखा जाता है। वर्ष 2026 में रंगोत्सव 4 मार्च को मनाया जाएगा, जबकि दहन 2 मार्च को निर्धारित है। यह आयोजन सामाजिक एकता, आस्था और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है।




