मीना देवी दिल्ली : आज का समाज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ सच्चाई छिपी नहीं होती, बल्कि सबकी नजरों के सामने होती है। लोग सब कुछ देखते हैं, सुनते हैं, समझते हैं, लेकिन जब सच बोलने या जिम्मेदारी निभाने की बारी आती है तो वही लोग अनजान बनने का चोला ओढ़ लेते हैं। और फिर बड़े मासूम अंदाज में पूछते हैं—”क्या बात है?”
रिश्ते की सच्चाई हो या संबंधों की कसौटी, अपना हो या पराया। जानकर भी अनजान रहना भी एक गंभीर सवाल बने रहता हैं। रिश्ते का लुकाछिपी हो रहा हो, या रिश्ते का कत्ल हो रहा हो, या जनता का हक छीना जा रहा हो, इन सबकी खबर अक्सर लोगों को पहले से होती है। लेकिन अधिकांश लोग अपनी सुविधा, स्वार्थ, डर या रिश्तों के कारण चुप्पी साध लेते हैं, और यही चुप्पी धीरे-धीरे गलत लोगों का सबसे बड़ा हथियार बन जाती है।

विडंबना यह है कि जब वही गलत काम बड़ा विवाद बन जाता है, तब लोग आश्चर्य जताते हैं, चर्चा करते हैं और पूछते हैं—”आखिर ऐसा कैसे हो गया?” जबकि सच्चाई यह है कि यदि समय रहते सच का साथ दिया गया होता, गलत के खिलाफ आवाज उठाई गई होती और जिम्मेदार लोग अपनी जिम्मेदारी निभाते, तो शायद हालात इतने खराब नहीं होते।
समाज ,समाजिक रिश्ते ,केवल कानून और प्रशासन से नहीं चलता, बल्कि जागरूक नागरिकों से भी चलता है। जब नागरिक जानबूझकर आंखें मूंद लेते हैं, तब गलत करने वालों का हौसला बढ़ता है। इसलिए केवल तमाशबीन बनकर खड़े रहना भी कहीं न कहीं उस अन्याय में भागीदारी बन जाता है।
आज जरूरत इस बात की है कि सच को सच कहने का साहस पैदा किया जाए। अगर हम जानते हैं कि गलत हो रहा है, तो उसे स्वीकार करने के बजाय उसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। क्योंकि इतिहास गवाह है कि अन्याय केवल गलत, अत्याचारियों, की वजह से नहीं बढ़ता, बल्कि उन लोगों की खामोशी से भी बढ़ता है जो सब कुछ जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं।

याद रखिए, सच्चाई से मुंह मोड़ लेने से सच्चाई बदल नहीं जाती। सवाल पूछने से पहले आईना देखना भी जरूरी है। क्योंकि कई बार “क्या बात है?” पूछने वाले ही पूरी बात जानते हैं, बस स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पाते। समाज को ऐसे दिखावटी अंजानपन से बाहर निकलना होगा। तभी न्याय, पारदर्शिता और विश्वास की मजबूत नींव रखी जा सकेगी, और जानते हुए,जानकर अनजान बनने वाले लोग, पूछने से यह कतराएंगे कि क्या बात है?






