मीना देवी दिल्ली : दुश्मन से उतना खतरा नहीं होता, जितना उस व्यक्ति से होता है जो आपके सामने दोस्ती का मुखौटा पहनकर पीठ पीछे छूरे भोंकते हैं।ऐसे लोग न तो पूरी तरह आपके होते हैं और न ही आपके दुश्मन के। उनका असली उद्देश्य केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है।
जीवन और समाज में ऐसे चेहरे अक्सर दिखाई देते हैं। वे दोनों के बीच भरोसा जीतते हैं, दोनों की गोपनीय बातें सुनते हैं और फिर समय व परिस्थिति के अनुसार , इस्तेमाल अपने लाभ के लिए करते हैं। कई रिश्ते, संस्थाएं और संगठन ऐसे ही दोहरे चरित्र वाले लोगों की वजह से टूट कर बिखर जाते हैं। विवादों की आग में अक्सर वही लोग घी डालते हैं, जो हर महफिल में खुद को सबसे बड़ा शुभचिंतक साबित करने की कोशिश करते हैं।

यह जरूरी नहीं कि जो व्यक्ति आपके विरोधी को जानता हो, वह आपका विरोधी भी हो। लेकिन यदि कोई आपकी निजी बातें, योजनाएं या कमजोरियां आपके विरोधियों तक पहुंचाता है, या दोनों पक्षों के बीच गलतफहमियां पैदा कर अपना लाभ उठाता है, तो उससे दूरी ही सबसे बड़ा बचाव है।
समझदारी इसी में है कि मित्रता भावनाओं से नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र, व्यवहार और समय-समय पर निभाई गई निष्ठा से परखी जाए। जो व्यक्ति हर परिस्थिति में आपका साथ निभाए, वही सच्चा मित्र है। जो हर दरवाजे पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराता फिरता है, वह अक्सर किसी का सगा नहीं होता।

इसलिए सावधान रहिए। विश्वास कीजिए, लेकिन विवेक के साथ। क्योंकि कई बार रिश्तों को सबसे गहरा घाव दुश्मन नहीं, बल्कि दोस्ती का मुखौटा पहनकर रहने वाले लोग ही देते हैं। जीवन में सही लोगों की पहचान ही आपकी सबसे बड़ी ताकत और सबसे सुरक्षित ढाल है। इसलिए सावधान! उनसे रहे जो आपके भी दोस्त हैं, और आपके दुश्मन की भी






