“साहब, चापलूसों का है जमाना, कहां है” आपका ठिकाना!
आज के संगीन दौर में अक्सर यह सुनने को मिलता है कि सच बोलने वालों से अधिक महत्व चापलूसी करने वालों को मिल रहा है। कई जगहों पर योग्यता, ईमानदारी और मेहनत से अधिक चमचागिरी को तरजीह दी जाती दिखाई देती है। ऐसे माहौल में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है—”साहब, चापलूसों का है जमाना, कहां है आपका ठिकाना?”
समाज और व्यवस्था की वास्तविक मजबूती उन लोगों से होती है जो सच्चाई का साथ देते हैं, न कि केवल प्रशंसा के पुल बांधते हैं। चापलूसी कुछ समय के लिए किसी को प्रसन्न अवश्य कर सकती है, लेकिन यह न तो स्थायी विकास का आधार बनती है और न ही सही निर्णय लेने में मददगार होती है। इसके विपरीत, सच्चा सलाहकार वही होता है जो आवश्यकता पड़ने पर गलत को गलत कहने का साहस रखता है।
साहब इतिहास गवाह है कि जिन संस्थाओं और नेतृत्व ने केवल प्रशंसा सुनना पसंद किया, वे समय के साथ कमजोर होते गए हैं। जिन्होंने आलोचना को भी स्वीकार किया और योग्य लोगों को सम्मान दिया, उन्होंने लंबे समय तक पारी खेलते हुए सफलता प्राप्त की है। इसलिए किसी भी पदाधिकारी या नेतृत्वकर्ता के लिए यह आवश्यक है कि वह चापलूसी और वास्तविक कार्य के कड़ी के बीच को समझे।
ईमानदार और कर्मठ लोगों का रास्ता भले ही कठिन रहता है,लेकिन योगदान समाज में स्थायी पहचान और छाप छोड़ता है। चापलूसी क्षणिक लाभ दे सकती है, परंतु सत्य और परिश्रम की चमक कभी फीकी नहीं पड़ती।
क्योंकि अंततः पद नहीं, बल्कि कर्म ही इंसान की पहचान और ठिकाना तय करते हैं। चाहे कितना भी हो चापलूसों का जमाना, फिर भी लोग पूछ ही लेते हैं, कहां है ,आपका ठिकाना।





