जमशेदपुर :महाशिवारात्रि सनातन परंपरा का एक अत्यंत पवित्र उत्सव है, जो फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है। यह अवसर चेतना और ऊर्जा के संगम का प्रतीक माना जाता है। “शिव” मंगलकारी तत्व का द्योतक है और “रात्रि” अज्ञान रूपी तम का संकेत देती है। मान्यता है कि इस शुभ बेला में उपवास, आराधना और रात्रि-जागरण से कष्टों का क्षय होता है तथा इच्छित फल प्राप्त होते हैं।
इस तिथि से संबंधित अनेक दंतकथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार इसी दिन शिवा और पार्वती का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न हुआ था, इसलिए इसे दिव्य परिणय पर्व भी कहा जाता है। दूसरी मान्यता सागर-मंथन प्रसंग से जुड़ी है, जब अमृत से पूर्व घातक विष “हलाहल” प्रकट हुआ। समस्त जगत की रक्षा हेतु शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया, जिससे वे नीलकंठ कहलाए। यह घटना भी इसी रजनी से संबद्ध मानी जाती है। एक अन्य विश्वास के अनुसार इस अवसर पर शिवलिंग का प्रथम आविर्भाव हुआ, इसलिए इस दिन लिंग-पूजन का विशेष विधान है।

इस पर्व पर श्रद्धालु प्रातः स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करते हैं और संकल्प लेकर निराहार या फलाहार रहते हैं। चार प्रहरों में पूजन का विधान बताया गया है, जिनमें विविध द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है। भक्ति-भाव से की गई साधना को अत्यंत फलदायी माना गया है।आध्यात्मिक दृष्टि से यह अवसर आत्ममंथन का आह्वान करता है। साधक ध्यान, जप और संयम द्वारा अंतर्मन की अशुद्धियों को त्यागने का प्रयास करता है। यह पर्व अंतःप्रकाश को जागृत कर जीवन में संतुलन, शांति और सकारात्मकता का संचार करने की प्रेरणा देता है। हर-हर महादेव।




