रांची : पुलिस महकमे में हुए हालिया तबादले ने एक बार फिर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस घटना को लेकर पूरे राज्य में चर्चाएं हुईं, उसका केंद्र जमशेदपुर रहा, लेकिन कार्रवाई की गूंज सरायकेला-खरसावां तक पहुंच गई। अब आम जनता से लेकर प्रशासनिक गलियारों तक एक ही सवाल तैर रहा है—क्या किसी और की गलती की सजा किसी दूसरे अधिकारी को दी गई? आखिर ऐसा क्यों?
चर्चाओं के अनुसार, सरायकेला-खरसावां की पुलिस अधीक्षक का महज 70 से 75 दिनों के भीतर ही तबादला कर दिया गया। इतने कम समय में किसी भी अधिकारी के कामकाज का निष्पक्ष मूल्यांकन कर पाना आसान नहीं माना जा सकता । चर्चाओं के अनुसार मैडम अभी अपना सरकारी आवास तक पूरी तरह व्यवस्थित नहीं कर पाई थीं। जिले की कानून-व्यवस्था को समझने, टीम के साथ तालमेल बनाने और अपनी कार्यशैली दिखाने का पर्याप्त अवसर भी उन्हें नहीं मिल सका।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी घटना का मुख्य केंद्र दूसरा जिला था, तो सरायकेला-खरसावां के नेतृत्व पर इतनी जल्द कार्रवाई क्यों हुई? क्या यह केवल संयोग था या फिर किसी बड़े प्रशासनिक समीकरण का हिस्सा? इन सवालों के जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं हैं, लेकिन चर्चाओं का बाजार जरूर गर्म है।
प्रशासनिक निर्णयों का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन पारदर्शिता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि किसी अधिकारी को हटाने के पीछे ठोस कारण हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए था, ताकि अफवाहों और अटकलों पर विराम लग सके। अन्यथा ऐसे फैसले ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों का मनोबल भी प्रभावित कर सकते हैं।
हालात अब सामान्य हो चुके हैं, लेकिन तबादले को लेकर चर्चाएं अभी भी तेजी से चल रही है। लोग पूछ रहे हैं, क्या किसी अधिकारी को अपनी क्षमता दिखाने का पर्याप्त अवसर भी नहीं मिलना चाहिए था?
फिलहाल जनता के बीच एक ही सवाल गूंज रहा है—”गलती किसी और की, सजा किसी और को… आखिर ऐसा क्यों ?






