रांची : जमशेदपुर में हुई हालिया वारदात ने एक बार फिर कानून-व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर सामने ला दी है। सवाल केवल एक हत्या का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है, जिस पर आम नागरिक अपनी सुरक्षा का भरोसा करता है। जब पुलिस की मौजूदगी में अपराधी बेखौफ होकर हमला कर दें और एक युवक की जान चली जाए, तो यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि व्यवस्था की गंभीर विफलता है।
आज शहर का हर नागरिक पूछ रहा है—यदि पुलिस वाहन से खींच कर हत्या कर दी जाती है तो , आदमी किसके भरोसे, घर से बाहर निकले? अपराधियों के बढ़ते हौसले यह संकेत देते हैं कि कहीं न कहीं कानून का भय कमजोर पड़ता जा रहा है। यही वजह है कि अब घटना के साथ-साथ पुलिस की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है।
पुलिस का काम केवल एफआईआर दर्ज करना या घटना के बाद गिरफ्तारी करना नहीं, बल्कि अपराध को रोकना भी है। यदि अपराधी पुलिस की मौजूदगी में , और पुलिस जीप में ही हमला कर दें, तो सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी और स्वाभाविक है। इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस की तत्परता, रणनीति और जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

निस्संदेह, हर घटना का निष्पक्ष और तथ्यपरक मूल्यांकन होना चाहिए। यदि कहीं सुरक्षा व्यवस्था में चूक हुई है, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। कानून का राज तभी मजबूत होगा, जब अपराधियों में भय और आम नागरिकों में विश्वास दोनों दिखाई देंगे।
आज जरूरत केवल आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जहां अपराधी कानून से डरें और जनता पुलिस पर भरोसा कर सके। क्योंकि जब सुरक्षा पर ही सवाल उठने लगें, तो कठघरे में केवल अपराधी नहीं, पूरी व्यवस्था , पुलिस प्रशासन खड़ी नजर आती है






