
जमशेदपुर : जमशेदपुर स्थित एलबीएसएम काॅलेज में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के पहले दिन का दूसरा सत्र टेक्निकल सत्र था, जो सेमिनार हाॅल, कान्फ्रेंस रूम और बहुत उद्देश्यीय सभागार में आयोजित हुआ। इस दौरान सत्यानंद भगत ने सिनेमा पर केंद्रित वक्तव्य में कहा कि इसके कारण युवा पीढ़ी की नैतिकता का ह्रास हुआ है । उन्होंने एक आंकड़ा देते हुए बताया कि 2014 में 84 करोड़ जीबी डाटा का उपयोग किया गया जबकि चार साल बाद 2018 में 4640 करोड़ जीबी डाटा का उपयोग किया गया और 30% से ज्यादा इंडियन अश्लीलता की ओर धकेल दिए गए। यह बात साबित करती है कि सिनेमा का बढ़ता प्रभाव खास करके जीबी डाटा का बढ़ता प्रभाव और विविध विषयों तक युवाओं की पहुंच के कारण युवाओं में भटकाव भी पैदा हुए और यही कारण है कि उनका चारित्रिक पतन हुआ है। नैतिकता की परिभाषा में बदलाव आया है।अध्यक्षता करते हुए डाॅ. संजीव आनंद ने कहा कि जीवन सीखने की प्रक्रिया है। सत्यानंद जी का उदाहरण देते उन्होंने बताया की नैतिकता की निश्चित परिभाषा नहीं है, लेकिन एक छोटी क्राइटेरिया का निर्धारण किया जा सकता है। जो समाज द्वारा निर्धारित होती है उसे नैतिकता कहते हैं और उन्होंने समाज द्वारा निर्धारित इस नैतिकता की परिभाषा के तीन अंग बताएं पहला, इंटेंशनली किसी को दुख नहीं देना या किसी से बदला ना लेना; दूसरा, किसी भी व्यक्ति को आर्थिक हानि न पहुंचाना और तीसरा, यदि आप किसी का हित नहीं कर सकते हैं तो उसका अहित भी ना करें । इस प्रकार या तीनों कारक नैतिकता की परिसीमा निर्धारित करते हैं। रिसोर्स पर्सन डाॅ. अर्चना कुमारी ने समाज पर तकनीकी के बढ़ते प्रभाव तथा सामाजिक आर्थिक दशाओं में होने वाले बदलाव पर चर्चा प्रस्तुत करते हुए कहा कि अधिकतर लोग भारत की कृषि पर आधारित है। भारत की स्वयं की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था एक संक्रमण अवस्था से गुजर चुकी है। यहां पर इस तकनीकी विकास ने सर्वप्रथम अगर कोई क्रांति आई तो वह थी हरित क्रांति। नए बीजों का आविष्कार, अधिक उपज देने वाले बीजों के आविष्कार, उर्वरकों के भारी प्रयोग, कीटनाशकों के प्रयोग तथा यंत्रों के प्रयोग के कारण भारत में सबसे पहले कृषि क्षेत्र में विकास होता है। इसके बाद सूचना क्रांति तकनीक का विकास होता है और इस सूचना क्रांति के विकास के आधार पर भारत आज विश्व के बेहतरीन शैक्षिक व्यवस्था के देशों में जाना जाता है। इसी तरह से सुनीता मित्रा सरकार ने अपने शोध पत्र ‘इंडियन डेमोक्रेसी सोशल मूवमेंट वाइस वर्सा इंडियन स्टेट्स’ विषय पर शोध पत्र प्रस्तुत करते हुए प्रजातंत्र को परिभाषित किया, उसकी उत्पत्ति को समझाया और प्रजातंत्र के आयाम की चर्चा की। उन्होंने प्रजातंत्र की मजबूती के बारे में विचार रखा, सामाजिक आंदोलन की चर्चा की, उसकी आवश्यकता को बताया, उनकी आवश्यक का घटकों की चर्चा की। डाॅ. गुमडा मार्डी ने संताल समुदाय पर केंद्रित अपने आलेख में कहा कि सदियों से संतालों के साथ-साथ अन्य आदिवासी समूहों को जंगलों में आदिम जीवन जीने के लिए मजबूर किया गया। उनके ऊपर शोषण एवं दमन जारी रहा। दुनिया के सामने उनकी भाषा संस्कृति को विकसीत नहीं होने दिया गया । असभ्य और जंगलीपन की पहचान थोप कर उनमें हीन भावना भरी जाती रही। जबकि जरूरी है कि विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए आदिवासी अवधारणाओं को अपनाया जाए।
टेक्सनिकल सत्र में रांची महिला महाविद्यालय की असिस्टेंट प्रो. कुमारी भारती सिंह ने भारतीय अंग्रेजी लेखन का हालिया रुझान, शोधार्थी तूलिका दत्त ने ‘भारत में महिलाओं का सशक्तिकरण’, मंजू कुमारी ने ‘तसर उद्योग में महिलाओं की भूमिका’, डाॅ. अखौरी मनीषा सिन्हा ने ‘भारत में मानवाधिकार की दशा व दिशा : एक अध्ययन’, श्वेता श्रीवास्तव ने ‘भारत में पंचायती राज व्यवस्था का प्रावधान एवं क्रियान्वयन : संदर्भ- झारखण्ड’, डॉ. अंशु श्रीवास्तव ने ‘भारत में नैतिक विकास’, सुभाष चंद्र महतो ने ‘मध्यकालीन कुड़माली काव्य में निर्गुण भक्ति परम्परा : एक अध्ययन’, निसोन हेम्ब्रम ने ‘संताली लोक गीतों की साहित्यिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि’, डॉ. शबनम परवीन ने ‘महिला सशक्तीकरण’ विषय पर प्रमुख रूप से अपने रिसर्च पेपर पढ़े।अंत में सर्वश्रेष्ठ तीन आलेख प्रस्तुति करने वाले श्वेता श्रीवास्तव, अंशु श्रीवास्तव एवं पंकज कुमार को पुरस्कृत किया गया। संचालन भूगोल विभाग की अध्यक्ष प्रो. रितु ने किया। अध्यक्षता डाॅ. अजय वर्मा ने की। समन्वयक डाॅ. विजय प्रकाश थे।प्रतिवेदक की जिम्मेवारी डाॅ. सन्तोष कुमार, डाॅ. प्रशांत और डाॅ. सुधीर कुमार ने निभाई।





